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आज़ सांयकाल की बेला में अचानक उनसे मुलाकातें होना किसी इत्तेफ़ाक से कम न था। सबसे पहले उनकी और हमारी नज़रें एक दूसरे पर पड़ी थी जो किसी जन्नत से कम न थी। उनकी मुस्कराहट और शर्मीली नज़रों से बार-बार मुझे निहारना अपना होने का हक जताने से कम न थी। आंखों में बेशुमार प्यार और नज़रों में शरारत का भाव प्रतीत हो रही थी ऐसे मानो कि भविष्य में कुछ घटित घटना होने वाली थी। अंदर से दिल जोर – जोर से धड़क रहा था और मन कुछ गुफ्तगू करने को जी करता था। उनकी मखमली और गोरी बदन में लाल साड़ी का धारण करना, माथे पे लाल छोटी-छोटी बिंदी और मनटीका, दोनों कान में झुमका, नाक में छोटी नथुनी, दोनों हाथों की कलाइयों में लाल-लाल सुंदर चुड़ियां, दोनों हाथों की हथेलियों पर रची हुई सुंदर-सुंदर लाल मेंहदी, दोनों पैरों में सुंदर-सुंदर पायल और अंगुलियों में सुंदर-सुंदर बिछिया, नशीली आंखें, पतली और बलखाती हुई कमर, पतली होंठ, खामोश जुबां और उनकी प्यारी अदाएं ऐसे मानों कि जादू का कहर ढा दिया हो। कुछ पल प्यार भरी मीठी-मीठी बातें और थोड़ी-सी हंसी-मज़ाक और फ़ुहारें का क्या कहना ऐसे मानों कि इंद्र ऊपर से बारिशों की फुहार बरसा रहे हों और दो बदनों को आपस में भींगा रही हो और दिल को ठंडक पहुंचा रही है। उसके बाद अपनी प्यारी और नाज़ुक हाथों से मेरे कंधों को पकड़ते हुए और चुपके से मेरे कान में प्यार से मीठी जादुई आवाज़ों में कहते हुए कि थोड़ा-सा आप कुछ खा-पी लें जो मैंने नाना प्रकार के सुंदर-सुंदर पकवान आपके लिए अपनी प्यारी हाथों से बनायी हूं। ज्योंहि मैंने ऐसा श्रवण किया तो कुछ पल के लिए स्वयं को पाया कि वसुंधरा लोक पर कहीं किसी राजकुमार से कम तो नहीं हूं न। उन्होंने मेरे लिए कुर्सी और टेबल पर थाली लगाईं पर मैंने मना कर दिया और मैंने ज़मीं पर बैठकर खाने के लिए विनम्र भाव से निवेदन किया। उन्होंने खामोश होकर और अपनी जुबां से कुछ न कहकर बस अपना सिर हिला दी थोड़ी-सी अपनी आंखों से हामी भर दी। उन्होंने मुझे ज़मीं पर ही आसन लगाया और अपनी प्यारी हाथों से बनाई हुई नाना प्रकार के व्यंजनों से मुझे रसपान कराई। बीच-बीच में कुछ प्रेम भरी मीठी-मीठी बातें भी की। मैं मना करते गया और वो जबरदस्ती मुझे अधिक खिलाती रही। उनकी जिदपाना के समक्ष मेरी कुछ न चल सकी पर हां उनके जिदपाना में अपनों के प्रति प्यार के अच्छे भाव दिख रहे थे। वो तो मेरा सच्चा प्रेम और अपने नटखट कान्हा की दिवानी हो गई थी। एक पल के लिए वो सबकुछ भूलकर केवल नटखट कान्हा के प्रेममय स्वरूप को चुपचाप निहार रही थी। अपनी सुध-बुध खो बैठी। कई सदियों के बाद ऐसा पल दिखने को मिला। थोड़ी-सी शिकवा-शिकायतें, थोड़ी-सी चाहतें, अपनी तकलीफ़ों को धीरे-धीरे बयां की। मैंने बड़े प्यार से, मुस्कुराते हुए और मौन होकर सबकुछ सुना। उसके बाद मैंने बस इतना ही कहा कि मैं तेरा हूं न और हमेशा तेरा ही रहूंगा। हमेशा साथ दूंगा और तुम्हारी सारी चाहतें पूरा करूंगा। उन्हें मेरी बातें पर पूरा यक़ीन था क्योंकि उन्हें पता था कि मैं कभी झूठ नहीं बोला करता। उनके यहां से विनम्र भाव से विदा होने की आज्ञा मांगी क्योंकि मुझे थोड़ी -सी हल्की-हल्की ठंड भी लग रही थी। मुझे अपने घर की ओर रवाना भी होना था जो कुछ दूर था। घर जाने का नाम सुनते ही उनके दोनों आंखों में थोड़ी-सी आंसू छलके और मन कुछ उदास था ऐसे मानो कि कुछ पल के लिए खुशी के भाव अचानक दुख में तब्दील हो गये। मैंने अपना प्रेम का शब्द बाण चलाया तो उनकी प्यारा-सा चेहरा और पतली होंठ पर खुशी के भाव खिल उठे और खुशी से एक बार पुनः मुस्कुराई। मैंने जाते-जाते दो शब्द कुछ व्यंग्य में कहा तो वो शर्माते हुए और दौड़ते हुए अपने दरवाजे के पर्दे के पीछे जाकर छुप गयी। क्या यह भी प्रेम का कोई अन्य स्वरुप था ? हां, हो सकता था। भले मैं उनके भाग्य में न था पर दिल में तो कबसे राज़ कर रहा हूं जिसका ज़िक्र उन्होंने मुझे एक बार किया था कि मुझे भी नहीं पता था कि कब आप मेरे अपने बन गये। सच्चा प्रेम कभी भी दैहिक सुख की कामना नहीं किया करता वो तो हृदय की मिलन है न जब कभी मिलन होती है तो दिल को सुकून मिलती है और आत्मा तृप्त हो जाती है। प्रेम तो प्रेम है बस कोई सच्चा प्रेम के मर्म को तो समझने की कोशिश करें।
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प्रकाश राय (युवा साहित्यकार)
समस्तीपुर, बिहार 🖊️🖊️