पत्थर के लोग रहते हैं पत्थर के शहर में, तुम कितने खुशनसीब हो कि दिल में रहते हो, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,

एक सच्चा शायर, एक गीतकार जब भी किसी उनवान पर कलम चलाता है तो उसमें उसका अक्स भी दिखाई देता है। मैने अपनी शायरी में हमेशा इस बात का खयाल रक्खा कि मेरे जो भी कलाम समायीन और श्रोताओं तक पहुंचे वोह हकीकत की अक्कासी ज़रूर करें। आज कुछ ऐसे ही कतात और मुक्तक के साथ रूबरू हो रहा हूं,,,
1/ उस शख्स को बच्चों से मुहब्बत भी बहुत थी
उस पे यह सितम भूख की शिद्दत भी बहुत थी
ठंडक की सख्त रातों में देखा यही अक्सर
तन पर लेबास की उसे किल्लत भी बहुत थी,,

2/ पत्थर के लोग रहते हैं पत्थर के शहर में
तुम कितने खुशनसीब हो कि दिल
में रहते हो
कितनी हसीन हैं तेरे ख्वाबों की किरचियां
मुश्किल यह है कि कुछ तुम मुश्किल से कहते हो,

3/ कभी मीरा के दिल में था कभी राधा के दिल में जो
यशोदा का वोह नंदलाला वही घनश्याम है मेरा
मैं मुस्लिम हूं मगर मुझको भी उतनी ही मुहब्बत है
कि जैसे आपका वैसे ही चारो धाम है मेरा,

4/ आपका महफिल में आना है ज़रूरी
ज़िंदगी क्या है बताना है ज़रूरी
छोड़िए दुनिया की बातें, रंज ओ गम
ज़िंदगी में मुस्कुराना है ज़रूरी,,,

5/ प्यार है तो आयेगा ख्वाबों को सजाएगा
नीले आसमां के तले दिल यह मुस्कुराएगा
दिल है तो गाएगा नशा है तो छाएगा
चाहतों के मौसम में प्यार है तो आयेगा,,,

,,,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,,

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