अनुराग लक्ष्य, 23 फरवरी
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुंबई संवाददाता ।
,,, ऐ शहर ए लखनऊ तुझे मेरा सलाम
मुद्दत हुई न कर सका तुझसे कोई कलाम
ऐ मेरे खुदा शुक्र तेरा कैसे हो अदा
मुद्दत के बाद आज गुज़ारी है एक शाम,
जिस तरह फूल में खुशबू दूध में मक्खन पत्थर में अग्नि और मेंहदी में लाली छिपी रहती है उसी तरह यह दो कुंभ राशियों वाली विभूतियां संजय पुरुषार्थी और सलीम बस्तवी अज़ीज़ी भी एक दूसरे की धड़कनों में रचते है और बस्ते हैं। इसका सीधा प्रमांण है, एक लंबे अरसे बाद लखनऊ की सरजमीन पर एक दूसरे का मिलना।
खुदा इस ज़माने की बदनीगाही से महफूज़ रखे और इस गंगा जमुनी तहज़ीब का सिलसिला अनवरत चलता रहे इस शेर के साथ, कि
,, कभी मीरा के दिल में था कभी राधा के दिल में जो
यशोदा का वोह नंदलाला वही घनश्याम है मेरा
मैं मुस्लिम हूं मगर मुझको भी उतनी ही मुहब्बत है
कि जैसे आपका वैसे ही चारो धाम है मेरा,,
वक्त का तकाज़ा है कि इस देश की गंगा जमुनी तहज़ीब को हम और आप जैसे साहित्यकार और अदब नवाज़ ज़िंदा रखें।