मनज़र किसी के हुस्न का बेहद अजीब था-असलम तारिक

ग़ज़ल 

कल तक वो मेरी ज़ीस्त के बेहद क़रीब था
गमखवार और मॉनिसो हमदम हबीब था

इक चाँद आसमाँ पे था इक सामने मेरे
मनज़र किसी के हुस्न का बेहद अजीब था

इक लम्हा भी सुकून मयससर न था मुझे
फुरक़त का आशिक़ी में वो आलम मुहीब था

कब किसका दौर एक सा रहता है दोस्तों
वो शख्स है अमीर जो कल तक गरीब था

नुस्खा कोई भी कारगर इसमें न हो सका
इश्क़े जूनूँ के सामने बेबस तबीब था

मुंशी प्रेम चंद का ज़िन्दा रहेगा नाम
मिस्ले क़मर जहाँ में वो ऐसा अदीब था

दुनिया के ज़ुल्मो जौर ने मुजरिम बना दिया
ये जानते हैँ लोग वो पहले नजीब था

देखी जो उसकी एक झलक दूर गम हुए
इतना ज़ियादा दिल के वो मेरे क़रीब था

इलज़ाम दे मै सकता नहीं हूँ किसी को भी
तारिक़ मेरा नसीब ही मेरा रक़ीब था

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