इक जलजले की भेंट चढ़ा जो मकान था-रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

ग़ज़ल 
हाकिम का ध्यान सब पे ही रहता समान था।
तब ही तो अपने मुल्क में अम्नो अमान था।

सर पर रही न छांव , ठिकाना न रात का।
इक जलजले की भेंट चढ़ा जो मकान था।

हाकिम के सामने था खड़ा हाथ जोड़कर।
शायद कि उस किसान पर बाक़ी लगान था।

इक रोज़ छोड़ कर के हमें तुम
भी जाओगे।
मन में हमारे इसका न वहमो गुमान था।

गूंगे से हो गये थे वहां बोलते भी क्या।
मिलता जहां न हमको कोई हम ज़ुबान था।

नीचे के लोग उसको लगे थे हक़ीर से।
हासिल हुआ था जब भी उसे इक मचान था।

लोगों के साथ मैं भी मिलाता गया क़दम।
जाना कहां है रूप मुझे कुछ न ज्ञान था।

रूपेंद्र नाथ सिंह रूप

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