रूक्मिणी, कन्हैया का विवाह जीव और ईश्वर का मिलन-उत्तम कृष्ण शास्त्री

9 दिवसीय संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा

बस्ती। जीव जब ईश्वर से प्रेम करता है तो ईश्वर जीव को भी ईश्वर बना देते हैं। राजकन्या होते हुये भी रूक्मिणी पार्वती जी के दर्शन के लिये पैदल ही गयी। रूक्मिणी और कन्हैया का विवाह जीव और ईश्वर का मिलन है। शरीर रूपी रथ को जो श्रीेकृष्ण के हाथों में सौंप देता है उसे विजय श्री मिलती है । यह सद् विचार स्वामी उत्तम कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने दक्षिण दरवाजा के निकट आयोजित 9 दिवसीय संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा के सातवे दिन व्यासपीठ से व्यक्त किया।

महात्मा जी ने कहा कि रुक्मिणी लक्ष्मी का अवतार है। उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रेम विवाह किया था। रुक्मिणी भगवान कृष्ण की पत्नी और रानी हैं। द्वारिका के राजकुमार कृष्ण ने उनके अनुरोध पर एक अवांछित विवाह को रोकने के लिए उनका अपहरण कर लिया और उनके साथ भाग गए और उन्हें दुष्ट शिशुपाल से बचाया। महात्मा जी ने कहा कि रुक्मिणी के जीवन की एक घटना यह बताती है कि भौतिक धन से अधिक विनम्र भक्ति का मूल्य है। रुक्मिणी एक समर्पित पत्नी है, जो अपने प्रभु की सेवा में विनम्र है। उनकी भक्ति ही उसकी वास्तविक आंतरिक सुंदरता है।

कंस वध का वर्णन करते हुये महात्मा जी ने कहा कि कंस के अत्याचार से पृथ्वी त्राह त्राह जब करने लगी तब लोग भगवान से गुहार लगाने लगे। तब कृष्ण अवतरित हुए। कंस को यह पता था कि उसका वध श्रीकृष्ण के हाथों ही होना निश्चित है। इसलिए उसने बाल्यावस्था में ही श्रीकृष्ण को अनेक बार मरवाने का प्रयास किया, लेकिन हर प्रयास भगवान के सामने असफल साबित होता रहा। श्रीकृष्ण ने अपने मामा कंस का वध कर मथुरा नगरी को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिला दी।

महारास प्रसंग में महात्मा जी ने कहा कि महारास प्रेम का उच्चतम और पवित्र शिखर है, जहां कई आत्माओं के एक दूसरे में समाहित होकर भी कामदेव विजय प्राप्त नहीं कर सके।बांसुरी की धुन पर गोपियों को अपने पास बुला भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रत्येक को अपनत्व का अहसास कराने वाली लीला महारास का इतिहास ब्रजभूमि की दिव्यता और पावनता पर अमिट छाप छोड़ती है। कामदेव का अहंकार चूर करने के लिए किया गया महारास कान्हा के जीवन का वो अभिन्न हिस्सा है, जिसके बिना राधाकृष्ण के प्रेम की कल्पना अधूरी ही रह जाएगी।

यज्ञाचार्य श्री विष्णु शरण शास्त्री, वेद प्रकाश शास्त्री, विनीत शास्त्री, पं पंकज शास्त्री, पं रंजीत शास्त्री, विनीत शास्त्री, पं. शुभम आदि ने विधि विधान से वैदिक परम्परानुसार पूजन कराया।मुख्य यजमान दिनेश चन्द्र पाण्डेय ने विधि विधान से परिजनों, श्रद्धालुओं के साथ व्यास पीठ का वंदन किया। देवेश पाण्डेय, अविनाश पाण्डेय, पिकूं पाण्डेय, प्रदीप चन्द्र पाण्डेय, दिलीप चन्द्र पाण्डेय, राहुल सांकृत्यायन, जया, वागार्थ सांकृत्यायन, शिवम, शुभम, ओमजी, सुमन, अर्चना, प्रतिभा, अंजु, प्रमिला, प्रतिमा, पूर्णिमा, कंचन, सात्विक, बंटी, क्षमा, सविता, दीक्षा, राकेश चन्द्र श्रीवास्तव के साथ ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

 

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