अनुराग लक्ष्य, 9 जुलाई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
किसी इंसान के दिल में जब साहित्य और अदब की रोशनी टिमटिमाती है, या मुहब्बत की शमां रोशन होती है। तो इसमें कोई शक नहीं कि वोह अल्लाह का खास बंदा होता है। और उस इंसान पर दुनिया बनाने वाले की खास नज़र होती है ताकि वोह समाज को एक नई दिशा दे सके और दुनिया में मुहब्बत तकसीम कर सके।
इसी फेहरिस्त बस्ती शहर का एक उभरता हुआ नौजवान शायर आज हमारे बीच अपने मयारी कलाम से सामईन से रूबरू हो रहा है। जिसे शोअरा हज़रात काफी पसंद भी कर रहे हैं। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज उसी नौजवान शायर की एक ग़ज़ल से आप को रूबरू करा रहा हूँ।
1/ ख़ुद अपने राज़ से पर्दा उठा दिया मैंने,
किसी को नाम तुम्हारा बता दिया मैंने ।
2/ तमाम जुगनुओं की रोशनी के साए में,
चराग़ सोच समझकर बुझा दिया मैंने ।
3 / कई दिनों से मेरा आस्माँ उदास रहा,
जो क़ैद में था परिंदा उड़ा दिया मैंने ।
4 / उसे तो अपनी फ़क़त प्यास ही बुझानी थी,
उसे को देखिए दरिया थमा दिया मैंने ।
5 / मुझे ठहरना पड़ा अपने रास्ते में मगर,
मुसाफिरों को बहुत रास्ता दिया मैंने ।
6 / अब उसके बाद कभी उसका जिक्र मत करना,
उस आदमी को कभी का भुला दिया मैंने ।
7 / उसी ने छीन लिया आसमान ही मेरा,
कभी किसी को अगर आसरा दिया मैंने ।
पेशकश,,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी