शीला देवी की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और बदलाव की एक प्रेरणादायक मिसाल है

बस्ती , बस्ती जनपद के हर्रैया क्षेत्र के एक छोटे से गाँव महुवापार में रहने वाली शीला देवी की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और बदलाव की एक प्रेरणादायक मिसाल है। साधारण परिवार में जन्मी शीला देवी का जीवन शुरू से ही चुनौतियों से भरा रहा। आर्थिक स्थिति कमजोर थी, संसाधनों की कमी थी और भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट दिशा भी नहीं थी। लेकिन उनके भीतर कुछ करने की चाह और आत्मनिर्भर बनने का सपना हमेशा जीवित रहा।
शीला देवी बताती हैं कि पहले उनका जीवन पूरी तरह दूसरों पर निर्भर था। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें साहूकारों से ऊँचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता था। यह कर्ज धीरे-धीरे उनके लिए एक बोझ बनता जा रहा था। कई बार तो ऐसा लगता था कि इस कर्ज के जाल से निकलना असंभव है। घर की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करना भी मुश्किल हो जाता था। ऐसे में जीवन निराशा और चिंता से घिरा रहता था।
इसी दौरान उनके गाँव में स्वयं सहायता समूह की शुरुआत हुई। गाँव में आई आईसीआरपी दीदी ने महिलाओं को समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में शीला देवी को संकोच हुआ, लेकिन जब उन्होंने अन्य महिलाओं को जुड़ते देखा तो उन्होंने भी हिम्मत जुटाई और 12 महिलाओं के साथ मिलकर “कृषि आजीविका स्वयं सहायता समूह” का गठन किया। यही वह मोड़ था जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
समूह से जुड़ने के बाद शीला देवी को बचत और वित्तीय प्रबंधन के बारे में जानकारी मिली। हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत करना, समूह के माध्यम से ऋण लेना और समय पर उसे चुकाना-ये सब बातें उन्होंने सीखी। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा। उन्हें यह महसूस हुआ कि अगर सही दिशा और सहयोग मिले तो वे भी कुछ बड़ा कर सकती हैं।
समूह को समय-समय पर विभिन्न योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता भी मिली। आरएफ (Revolving Fund) के रूप में 15,000 रुपये, सीआईएफ (Community Investment Fund) के रूप में 1,10,000 रुपये और सीसीएल (Cash Credit Limit) जैसी सुविधाओं ने समूह को मजबूत बनाया। इन संसाधनों ने शीला देवी को अपने सपनों को साकार करने का अवसर दिया।
शीला देवी ने ठान लिया कि अब वे खुद का व्यवसाय शुरू करेंगी। उन्होंने समूह के माध्यम से 2 लाख रुपये का ऋण लिया और इलेक्ट्रॉनिक एवं कपड़ों की दुकान खोलने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाजार की समझ कम थी, ग्राहकों को आकर्षित करना चुनौतीपूर्ण था और प्रतिस्पर्धा भी काफी थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उन्होंने अपने व्यवसाय को समझना शुरू किया। उन्होंने ग्राहकों की जरूरतों के अनुसार सामान रखना शुरू किया, उचित दाम पर वस्तुएँ उपलब्ध कराईं और ग्राहकों के साथ अच्छा व्यवहार बनाए रखा। उनकी मेहनत रंग लाने लगी और दुकान चलने लगी। आज उनकी दुकान गाँव में एक भरोसेमंद स्थान बन चुकी है, जहाँ लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान और कपड़े खरीदने आते हैं।
आज शीला देवी की वार्षिक आय लगभग 3 से 4 लाख रुपये तक पहुँच गई है। यह वही शीला देवी हैं जो कभी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर थीं। अब वे न केवल अपने परिवार का खर्च चला रही हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अन्य जरूरतों का भी अच्छे से ध्यान रख पा रही हैं। उनका जीवन अब आत्मनिर्भरता और सम्मान से भरा हुआ है।
शीला देवी का कहना है कि स्वयं सहायता समूह ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। पहले जहाँ वे घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, अब वे समाज में एक सक्रिय और सम्मानित महिला के रूप में जानी जाती हैं। वे अन्य महिलाओं को भी समूह से जुड़ने और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं।
उनकी सफलता ने पूरे गाँव की सोच को भी बदल दिया है। अब गाँव की अन्य महिलाएँ भी आगे आकर छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर रही हैं। किसी ने सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया है, तो कोई डेयरी या कृषि कार्य में आगे बढ़ रही है। इस तरह एक महिला की सफलता ने पूरे समुदाय में सकारात्मक बदलाव की लहर पैदा कर दी है।
शीला देवी मानती हैं कि अगर सरकार की योजनाओं का सही तरीके से लाभ लिया जाए और मेहनत के साथ आगे बढ़ा जाए, तो कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत बदल सकता है। वे सरकार और उन सभी लोगों का धन्यवाद करती हैं जिन्होंने उन्हें यह अवसर दिया और उनके जीवन में बदलाव लाने में मदद की।
आज शीला देवी की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो अपनी परिस्थितियों से लड़ते हुए आगे बढ़ना चाहती हैं। यह कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, सामूहिक सहयोग और आत्मविश्वास के बल पर किसी भी कठिनाई को पार किया जा सकता है।
अंत में, शीला देवी की कहानी हमें यह सिखाती है कि बदलाव की शुरुआत खुद से होती है। अगर हम अपने भीतर विश्वास रखें और मेहनत करने का जज्बा बनाए रखें, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। महुवापार की इस साधारण महिला ने असाधारण साहस दिखाकर यह साबित कर दिया कि हर महिला के भीतर एक शक्ति छिपी होती है, जिसे पहचानने और आगे बढ़ाने की जरूरत है। उनकी यह यात्रा आज भी जारी है और वे लगातार नए सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यही उनकी असली सफलता है।
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