ग़ज़ल
दिलके हर जख्म से बेज़ार हुआ करते थे।
हम कभी इश्क़ में बीमार हुआ करते थे।।
इश्क़ के जज्बे लिए यार हुआ करते थे।
वक्त बे वक्त मददगार हुआ करते थे।।
सर कटा देते थे इक दोस्त की ख़ातिर यारो।
सुनते हैं दोस्त भी खुद्दार हुआ करते थे।।
जिसके आ जाने से हर सिम्त खुशी छाती थी।
उस मोहब्बत के तलबगार हुआ करते थे।।
जिनके लिखने से हुकूमत भी बदल जाती थी।
मुल्क में ऐसे कलमकार हुआ करते थे।।
ग़ैर का बोझ उठा लेते थे इन्साँ हर्षित।
पहले इन्सान के किरदार हुआ करते थे।।
विनोद उपाध्याय हर्षित