श्रीमद् भागवत कथा सुनने से मानव होता है भय मुक्त: पं हरिओम

हर्रैया(बस्ती)। नगर पंचायत के वार्ड नंबर 13 मंगल पाण्डेय नगर भदासी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस की कथा सुनाते हुए व्यास पंडित हरिओम कृष्ण जी महाराज ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल-वृंदावन में पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर आदि राक्षसों का वध किया। कालिया नाग का दमन किया और गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र का मान भंग किया।
कथा को विस्तार देते हुए कंस ने कृष्ण-बलराम को मारने के लिए मथुरा में धनुष यज्ञ रखा और अक्रूर को वृंदावन भेजा। अक्रूर जी कृष्ण-बलराम को रथ में बैठाकर मथुरा लाए। मथुरा पहुँचकर श्रीकृष्ण ने धोबी, कुब्जा का उद्धार किया और रंगशाला में रखे शिव धनुष को तोड़ डाला। अगले दिन कंस ने मलयुद्ध का आयोजन किया। कृष्ण ने चाणूर और बलराम ने मुष्टिक पहलवान का वध कर दिया। कुवलयापीड़ हाथी को भी मार डाला। फिर श्रीकृष्ण मंच पर चढ़कर कंस को केशों से पकड़कर नीचे पटक दिया और उसकी छाती पर चढ़कर उसका वध कर दिया। कंस के भाईयों को बलराम जी ने मार दिया।
कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने माता-पिता देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त किया और उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा बनाया। रुक्मिणी विवाह प्रसंग सुनाते हुए व्यास ने कहा कि विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी का अवतार थीं। वे मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। रुक्मिणी के भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया, जो चेदि देश का राजा और कंस का मित्र था। रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के हाथ श्रीकृष्ण को संदेश भेजा कि हे नाथ, मैंने आपको अपना पति वरण कर लिया है। शिशुपाल मुझे व्याघ्र के समान हर ले, उससे पहले आप आकर मुझे हर ले जाइए। मैं आपके सिवा किसी और को पति रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। यदि आप नहीं आए तो मैं प्राण त्याग दूंगी।”
पत्र पाकर श्रीकृष्ण तुरंत बलराम और सेना के साथ विदर्भ की ओर चल पड़े। विवाह के दिन रुक्मिणी गौरी पूजन के लिए मंदिर जा रही थीं। जैसे ही वे मंदिर से बाहर निकलीं, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया और द्वारका की ओर चल दिए। शिशुपाल, जरासंध और रुक्मी अपनी सेनाओं के साथ श्रीकृष्ण के पीछे दौड़े। श्रीकृष्ण ने सबको परास्त कर दिया। रुक्मी को बलराम जी ने बंदी बना लिया, पर रुक्मिणी के कहने पर श्रीकृष्ण ने उसका वध नहीं किया, सिर्फ सिर मुँड़वाकर छोड़ दिया। व्यास ने कहा कि द्वारका पहुँचकर श्रीकृष्ण ने वैदिक रीति से रुक्मिणी से विवाह किया। रुक्मिणी श्रीकृष्ण की पटरानी बनीं। इनके पुत्र प्रद्युम्न हुए जो कामदेव के अवतार थे। कहा कि कंस वध से धर्म की स्थापना और अत्याचार का अंत हुआ। भगवान अपने सच्चे भक्त की पुकार अवश्य सुनते हैं और उसकी रक्षा करते हैं। व्यास ने कहा कि जो भक्त प्रेम से कंस वध और रुक्मिणी विवाह की कथा सुनता है उसके सभी भय दूर होते हैं और भगवान का प्रेम प्राप्त होता है।इस मौके पर पंडित चंद्र शेखर तिवारी, बृज किशोर शुक्ल, सभासद प्रतिनिधि रमाकांत पांडेय, सुरेंद्र प्रताप नारायण पाण्डेय, सुधाकर पाण्डेय, बेनीमाधव तिवारी, ब्रह्मानंद पाण्डेय, दयानंद पाण्डेय, आशीष पाण्डेय, सचिन, बिपिन, बटुकनाथ पाण्डेय, अच्युतानंद पाण्डेय, प्रफुल्ल, राघवेंद्र पाण्डेय, राघव राम पाण्डेय, सियाराम पाण्डेय, एडवोकेट श्यामाकांत पाण्डेय, सीताराम शरण पांडेय, दिलीप, रोहित, नीशू, पूजा, कृष्ण कुमारी, प्रीती, अन्नू सहित तमाम श्रोता मौजूद रहे।