गुलमोहर की छाँव में, सपने खिलते

गुलमोहर

 

गुलमोहर की छाँव में, सपने खिलते।

लाल पंखुड़ियों से, धरती मुस्कुराती रहती।

धूप सुनहरी शाखों पर, गीत लिखती।

पत्तों के बीच, हवाएं कहानियां बुनती।

गर्मियों में, ये ठंडी छाया बनता।

राहों पर बिखरे फूल, जैसे आग।

मन में जलती यादों को, रंगता।

खामोश खड़ा, मौसम की बातें सुनता।

हर डाल पर, धड़कता दिल खिलता।

जैसे सूरज, धरती पर उतर आया।

रंगों की बारिश से, जीवन महकता।

पथिक थककर, इसकी गोद में सोता।

चुपके से, ये दुख हल्का करता।

आसमान संग मिलकर, रंग नया रचता।

पंखुड़ियां जैसे, चिट्ठियां प्रेम की लिखती।

हर सुबह, ये उम्मीद दीप जलाए।

बचपन की गलियों की, खुशबू लौटाता।

नीले गगन तले, ये गीत सुनाता।

हर मौसम में, अपना रूप बदलता।

गुलमोहर, चुप रहकर भी कहानी कहता।

 

स्वरचित /मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़