माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप

काव्य: “माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप”

नवरात्रि का तृतीय प्रभात है आया,

माँ चंद्रघंटा ने जग को अपनाया।

माथे पर अर्धचंद्र की छाया,

शक्ति का अद्भुत रूप दिखाया।

स्वर्णिम आभा, तेज अपार,

दुष्टों के लिए प्रचंड प्रहार।

सिंह पर विराजे माँ भवानी,

भय मिटे, मिले सुख की निशानी।

घंटा की ध्वनि जब गूंज उठे,

असुरों के हृदय भी कांप उठे।

करुणा और क्रोध का संगम,

माँ का रूप है दिव्य और परम।

भक्तों के संकट हर लेती,

मन में नव आशा भर देती।

हर द्वार पे रक्षा का पहरा,

माँ ने हर दुख से उबारा गहरा।

जो सच्चे मन से ध्यान लगाता,

माँ का आशीष सदा ही पाता।

तीसरे दिन की महिमा न्यारी,

हर लेती पीड़ा सारी।

जय-जय माँ चंद्रघंटा भवानी,

तुमसे ही जग में खुशहाली आनी।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़