गर्मी के दिन – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव 

गर्मी के दिन

तपते सूरज ने आग उगाई,

धरती जैसे तवा बन जाए।

हवा भी जैसे रूठ गई हो,

साँसों में अंगार समाए।

पेड़ों की छाँव भी थक जाती,

पत्ते चुपचाप झुक जाते हैं।

नदियों के सूखे होठों पर,

प्यास के किस्से रह जाते हैं।

गौरैया भी चुप बैठी है,

आँगन में न चहचहाती है।

जल की एक-एक बूंद यहाँ,

जीवन का मोल बताती है।

दोपहर की लू जब चलती है,

राहें सुनसान हो जाती हैं।

मिट्टी के घरों की खुशबू भी,

पसीने में घुल जाती है।

पर इसी तपन की गोद में,

आमों की मिठास पकती है।

गर्मी के इन कठोर दिनों में,

जीवन की असली सीख मिलती है।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़