निस्वार्थ भक्ति करने से ही परमात्मा की प्राप्ति- वरन शास्त्री

 – पूतना वध समेत श्रीकृष्ण बाल लीला का किया वर्णन
पौली। ब्लॉक क्षेत्र के शंकरपुर बक्शीजोत में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह में मंगलवार को आचार्य वरन शास्त्री जी  ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं को श्रोताओं के बीच रखा। इसके साथ ही उन्होंने पूतना वध व भगवान श्री कृष्ण के नामकरण की कथा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया।
                कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए शास्त्री जी ने कहा कि जब योग माया ने कंस से कहा कि तुझे मारने वाला ब्रज में पैदा हो चुका है। तब उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया की वृंदावन,गोकुल समेत ब्रज में तीन महीने के अंदर पैदा होने वाले सभी बालकों का वध कर दिया जाए। इसी बीच पूतना भी आ गई और उसने कहा महाराज यह काम मुझे सौंपा जाए। वह गोकुल में नंद बाबा के यहां बालक के छठीआरे के अवसर पर पहुंची। जहां पर वह अत्यंत सुंदर वेश धारण करके बालक के सामने पहुंची। उन्होंने इसे देखते ही आंखे बंद कर ली। ऐसे में कई विद्वानों ने भगवान के आंख बंद करने का कई तरह से अर्थ निकाला है। पूतना भगवान को लेकर आसमान में उड़ गई। जहां पर उसने अपने स्तन में कालकूट विष लगाया था। उसे श्रीकृष्ण को पिलाने लगी। श्री कृष्ण ने दूध के साथ ही पूतना के प्राण भी हरण कर लिए। उन्होंने यह भी बताया कि पूतना पूर्व जन्म में महाराजा बली की पुत्री रत्न माला थी। जिसने भगवान बामन को अपना पुत्र बनाने की इच्छा प्रकट की। लेकिन जब भगवान बामन ने विशाल रूप धारण करके बलि के साम्राज्य को नाप लिया। तब उसने कहा कि ऐसे पुत्र को विष पिलाकर मार देना चाहिए। भगवान ने पूतना माता की दोनों इच्छाओं को पूर्ण किया और जो सद्गति माता यशोदा और देवकी की होती,ठीक वही सद्गति राक्षसी पूतना की हुए। इसके साथ ही सकटा सुर, तृणावर्त,बकासुर, आदि राक्षसों का भी भगवान ने वध किया।
     कथा में कमलावती देवी, अमृतलाल अनंतलाल, रामबाबू, धर्म बीर, श्री राम रामसूरत समेत बहुत से स्रोता मौजूद रहे।