महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। धर्मनगरी अयोध्या की पावन माटी पर इन दिनों भक्ति और कठिन तपस्या का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) की जन्मभूमि पर महाराष्ट्र से 190 जैन श्रद्धालुओं का एक विशेष दल पहुंचा है। इस दल की विशेषता यह है कि इसमें शामिल 148 श्रद्धालु 13 महीने के कठिन ‘उग्र उपवास’ का पालन कर रहे हैं।
भगवान ऋषभदेव की परंपरा का निर्वहन जैन समाज के अनुसार, अयोध्या प्रथम तीर्थंकर की जन्मभूमि और कल्याणक भूमि है। श्रद्धालुओं ने बताया कि जिस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने 14 माह का निराहार तप किया था, उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए ये श्रद्धालु 13 महीने के ‘अल्टरनेट डे’ (एक दिन छोड़कर एक दिन) उपवास का कठिन व्रत कर रहे हैं। इस तपस्या की पूर्णाहुति आगामी अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर की जाएगी।
कल्याणक भूमि के दर्शन का महत्व
समूह के ट्रस्टी विजय पोडवाल और उगमराज जी मेहता ने जानकारी दी कि जैन धर्म में दीक्षा, जन्म और केवलज्ञान से जुड़ी इस भूमि के दर्शन को उपवास काल में अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसी आध्यात्मिक उद्देश्य से ट्रस्ट द्वारा इस विशेष यात्रा का आयोजन किया गया है। दर्शन का क्रम: श्रद्धालु रत्नपुरी (भगवान धरमनाथ की जन्मस्थली) के साथ-साथ श्रीराम मंदिर परिसर में भी दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित करेंगे। इस अवसर पर संघ के अध्यक्ष तेजराज सोलंकी, ट्रस्टी विजय पोडवाल, उगमराज जी मेहता, राजेंद्र सोलंकी, रमेश छाजेड़ एवं भारत भाई राठौर सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे। आध्यात्मिक गरिमा का प्रसार
जैन समुदाय के इस उग्र तप और अटूट श्रद्धा ने अयोध्या की आध्यात्मिक आभा को और अधिक प्रखर कर दिया है। तीर्थ पुरोहितों और स्थानीय नागरिकों ने भी श्रद्धालुओं के इस कठिन संकल्प की सराहना की। अयोध्या की इस पावन भूमि पर जैन और सनातनी परंपराओं का यह मिलन भारतीय संस्कृति की विविधता और एकता का जीवंत उदाहरण पेश कर रहा है।