सूरदास जी कहते हैं —
“प्रेम जगत का सार ओ मनवा…”
प्रेम कोई शब्द नहीं,
कोई घोषणा नहीं,
कोई दिखावा नहीं।
प्रेम एक ऐसा भाव है
जो कहा नहीं जाता,
महसूस किया जाता है।
प्रेम तब है—
जब माँ माथे पर हाथ रखकर कह दे,
“मेरा बच्चा लाखों में एक है।”
प्रेम तब है—
जब देर से लौटो
और पिता की आवाज़ में चिंता हो,
“अरे बेटा, आज बहुत देर हो गई।”
प्रेम तब है—
जब घर के बड़े आशीर्वाद देकर कहें,
“खुश रहो बेटा, खूब तरक्की करो।”
प्रेम तब है—
जब भाभी मुस्कुराकर कहे,
“तेरे लिए लड़की देखी है,
कोई और पसंद हो तो बता देना।”
प्रेम तब है—
जब भाई कह दे,
“तू चिंता मत कर, मैं हूँ न तेरे साथ।”
प्रेम तब है—
जब मन उदास हो
और बहन कहे,
“चल, कहीं घूमकर आते हैं।”
प्रेम तब है—
जब दोस्त गले लगाकर कहे,
“तेरे बिना मज़ा नहीं आता यार।”
ये सब प्रेम के सच्चे रूप हैं…
इन्हें जीवन की भीड़ में
कभी खोने मत देना।
प्रेम सिर्फ BF–GF होना नहीं है।
प्रेम भक्ति है।
प्रेम सेवा है।
प्रेम ज़िम्मेदारी है।
प्रेम कर्म है।
प्रेम तब है—
जब छोटी-सी बच्ची
अपने पापा का सिर दबाती है।
प्रेम तब है—
जब पत्नी
पति के लिए चाय बनाकर
पहले एक घूँट खुद लेकर देखती है।
प्रेम तब है—
जब माँ
केक का सबसे अच्छा टुकड़ा
अपने बेटे को दे देती है।
प्रेम तब है—
जब फिसलन भरी राह पर
दोस्त कसकर हाथ पकड़ ले।
प्रेम तब है—
जब भाई देर रात मैसेज करे,
“घर समय पर पहुँच गए?”
प्रेम भीड़ में घूमना नहीं,
परवाह करना है।
किसी के चेहरे पर मुस्कान ले आना,
किसी थके मन को हल्का कर देना—
वही प्रेम है।
प्रेम सीखना है तो…
राम–सीता से सीखो —
जहाँ प्रेम मर्यादा, त्याग और विश्वास है,
जहाँ कर्तव्य भी प्रेम बन जाता है।
राधा–कृष्ण से सीखो —
जहाँ प्रेम समर्पण है,
आत्मा का आत्मा से मिलन है,
बिना अधिकार, बिना अपेक्षा।
शिव–पार्वती से सीखो —
जहाँ प्रेम धैर्य, तप और स्वीकार है,
जहाँ प्रतीक्षा भी पूजा बन जाती है।
प्रेम तब है—
जब पूरी दुनिया में
सिर्फ एक ऐसा व्यक्ति हो
जो आप पर विश्वास करे,
आपको जज न करे,
जैसे हैं वैसे स्वीकार करे।
प्रेम
पकड़ नहीं,
अधिकार नहीं,
दिखावा नहीं।
प्रेम है
परवाह,
समर्पण
और साथ।
जैसे एक भक्त का प्रेम
अपने इष्ट के साथ होता है—
जैसे गोपियों का,
जैसे हनुमान जी का।
क्योंकि प्रेम में
तो भगवान भी
अपने भक्त से हार जाते हैं।
प्रेम
न कोई शर्त,
न कोई मांग,
बस पूर्ण समर्पण ।
श्री राधे
नेहा वार्ष्णेय
दुर्ग छत्तीसगढ़