यूजीसी नियमों के विरोध में अधिवक्ताओं ने संविधान बचाने के लिए निकली विशाल रैली लगाये नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद अमित शाह मुरादाबाद के नारे
रिपोर्टर शक्ति शरण उपाध्याय
बस्ती। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों को लेकर असंतोष अब केवल शैक्षणिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का आंदोलन बनता जा रहा है। शुक्रवार को हर्रैया तहसील परिसर में अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर यूजीसी की नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन कर यह स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा से जुड़े किसी भी फैसले को बिना जनभागीदारी के स्वीकार नहीं किया जाएगा। अधिवक्ताओं ने जुलूस निकालते हुए राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन उप जिलाधिकारी हर्रैया को सौंपा।
इस आंदोलन का नेतृत्व सौरभ सिंह एडवोकेट ने किया। उनके साथ बार एसोसिएशन अध्यक्ष उमाकांत तिवारी एडवोकेट की सक्रिय मौजूदगी ने प्रदर्शन को मजबूती दी। तहसील परिसर में जुटे अधिवक्ताओं ने यूजीसी की नीतियों को “संवैधानिक मूल्यों पर हमला” बताते हुए कहा कि शिक्षा को नियंत्रित करने के नाम पर केंद्रीकरण थोपने की कोशिश की जा रही है। प्रदर्शन में संजीव कुमार मिश्रा, प्रेम नारायण सिंह, राजमणि पांडे, सत्येंद्र पांडे, मनोज सिंह, अभिषेक सिंह, अरुण त्रिपाठी, यशवंत सिंह, रवीश कुमार सिंह, शत्रुघ्न पांडे, काली प्रसाद शुक्ला, दीनदयाल दुबे, अजय सिंह, रमेश चंद्र शुक्ल सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता शामिल रहे। अधिवक्ताओं का कहना था कि यूजीसी द्वारा बनाए जा रहे नियम बिना व्यापक जनपरामर्श के लागू किए जा रहे हैं, जिससे न केवल विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है, बल्कि छात्रों के समान अवसर के अधिकार पर भी संकट खड़ा हो गया है। ज्ञापन में यह आरोप प्रमुखता से उठाया गया कि वर्तमान नीतियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के विपरीत हैं, जो समानता और शिक्षा के अधिकार की गारंटी देते हैं।
बार एसोसिएशन अध्यक्ष उमाकांत तिवारी एडवोकेट ने कहा कि शिक्षा को बाजार के हवाले करने की सोच लोकतांत्रिक भारत के लिए घातक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को कॉर्पोरेट ढांचे में ढालने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र उच्च शिक्षा से बाहर हो जाएंगे। एडवोकेट संजीव कुमार मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों मोहीनी जैन और उन्नीकृष्णन का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा राज्य का दायित्व है, न कि मुनाफे का साधन। उन्होंने कहा कि कोई भी नीति जो शिक्षा के मौलिक अधिकार में बाधा डाले, उसे चुनौती देना अधिवक्ताओं का संवैधानिक कर्तव्य है। विश्वविद्यालयों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा, जिसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ेगा। अभिषेक सिंह और अरुण त्रिपाठी एडवोकेट ने इसे “समाज के भविष्य से जुड़ा सवाल” बताते हुए चेतावनी दी कि जरूरत पड़ी तो आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा।