शीर्षक — क़ल्ब के खूँ से
क़ल्ब के खूँ से तेरा हाथ क्यों तर लगता है,
ये लहू तो मेरा ही खूँ-ए-जिगर लगता है।
तू कहीं भी बुला बे-खौफ़ चली आऊँगी,
ग़ैर-महरम से मुझे मिलने में डर लगता है।
मज़हबी बैर में उसको तो न बाँटों साहब,
देर हो या हो हरम रब का ही घर लगता है।
ना-ख़ुदा बिन ही मेरी नाव चला करती है,
मेरे वालिद की दुआओं का असर लगता है।
तेरे होने से ही रौनक थी गली कूचों में,
अब तो वीरान ये सारा ही नगर लगता है।
खूबियाँ मेरी ज़माने को बुरी लगती है,
मेरा हर ऐब मेरी माँ को हुनर लगता है।
ग़ैर के मुल्क में दो रोज़ भी ना जी पाऊँ,
मुझको मेरा ही वतन ख़ुल्द का दर लगता है।
फिर तो गंगा भी मुक़द्दस नहीं कर पाएगी,
तुमको बेटी का जनम पाप अगर लगता है।
ज़िंदगी तो ‘धरा’ तन्हा भी गुज़र जाती है,
हम-सफ़र हो तो बहुत खूब सफ़र लगता है।
– त्रिशिका धरा
कवयित्री एवं लेखिका
कानपुर, उत्तर प्रदेश