माँ: साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप – ज्योती वर्णवाल

माँ: साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप

ख्वाहिश नहीं कि दुनिया का हर शख्स तारीफ करे,

बस इतना काफी है कि माँ-बाप फक्र से कहें— “ये बच्चा हमारा है।”

मोबाइल की घंटी बजी, और फिर बातों का सिलसिला हुआ,

दूर होकर भी माँ, तुझसे रूबरू होने का गिला गया।

बातों-बातों में दिल के सारे जज़्बात खोल देती हूँ,

तेरे आँचल की छाँव को, मैं शब्दों में तोल देती हूँ।

जब समय मिलता है, तुझे अपनी रचनाएँ सुनाती हूँ,

कभी कातिल अंदाज़ में, तेरी सुंदरता का बखान कर जाती हूँ।

पापा पर छोटी-छोटी टिप्पणियाँ, मैं जानबूझकर छोड़ती हूँ,

ताकि तेरी मुस्कुराहट से, अपनी थकान को तोड़ती हूँ।

एक दिन फोन पर ही तूने पूछा— “क्या तू सच में मेरी ही बेटी है?”

मैंने कहा— “हाँ माँ! ये काया भी तेरी ही रेती है।”

माना कि रंग मेरा, तुझसा दूधिया और साफ़ नहीं,

पर तेरे अक्स के बिना, मेरा वजूद भी मुकम्मल नहीं।

मैं मिसेज़ देवी की वही चुलबुली सी गुड़िया हूँ,

तुम्हारी आँखों का तारा, छोटे कदमों की पुड़िया हूँ।

साँझ ढले जब तू कामों को समेटकर, आईने के सामने आती है,

सज-धज कर जब माथे पर तू, वो बड़ी सी बिंदी लगाती है;

दीपक जलाती हुई तू, साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लगती है, उस बड़ी सी बिंदी में माँ, तू दुर्गा का ही प्रतिरूप लगती है। पूरा परिवार तेरी खूबसूरती के कसीदे पढ़ता रहता है,

मेरा घर तेरी ममता की पावन लहरों में बहता है।

मोबाइल पर शुरू हुई वो बात, अब इबादत सी लगती है,

मेरी माँ, मेरे घर में साक्षात ‘लक्ष्मी’ की सूरत लगती है।

 

रचनाकार ज्योती वर्णवाल ✍️

नवादा (बिहार)