विषय-मुंडेर पर बैठी धूप
छत की मुंडेर पर, इस जनवरी की ठंडी हवाओं में,
बेख़बर सूरज की पहली किरण-सी बिखरती हो तुम।
लाल-नारंगी उजास ने जैसे मुंडेर पढ़ ली हो,
कोई क़ीमती ज़ेवर, चुपचाप धरती को पहनाती हो तुम।
क्या पता है तुझे, इस मुंडेर पर चिड़ियों का भी बसेरा है,
तिनकों में बँधा सपना, ठिठुरती सुबह का सफ़र है।
वे भी इसी तिलहर में पहली किरण गिनते हैं,
नन्हीं चोंचों में उम्मीद के दाने चुनते हैं।
धूप का इंतज़ार हर धरतीवासी करता है,
पत्ता, पत्थर, पानी—सब मन ही मन भरता है।
धूप आती है तो देह में जान उतरती है,
रात की जकड़न ढीली, साँसें फिर संवरती हैं।
पर छत की मुंडेर की तो बात ही अलग है,
यहाँ हर सुबह का उजाला थोड़ा और सघन है।
यहाँ से दुनिया नई-नई लगने लगती है,
पहली किरण में ही पूरी कहानी जगने लगती है।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)