दान का महापर्व छेर छेरा ….. डॉ. राम रतन श्रीवास “राधे राधे”

दान का महापर्व छेर छेरा ….. डॉ. राम रतन श्रीवास “राधे राधे”

 

बिलासपुर:: भारत विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं को अखंड विरासत में समेटे हुए है । यहां विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक त्योहारों का समूह है । छत्तीसगढ़ राज्य भारत में धान की सर्वाधिक किस्मों का उत्पादन करता है, जिनमें कई औषधीय किस्में भी शामिल हैं, जो इसे खास बनाती हैं। इसी श्रृंखला छेरछेरा छत्तीसगढ़ में दान का महापर्व है जो पौष पूर्णिमा (जनवरी) को मनाया जाता है। किसान चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद जो फसल पाते हैं उसमें से थोड़ा-सा अंश पौष पूर्णिमा के दिन दान करते हैं। डॉ. राधे राधे का कहना है कि इस पर्व का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सामाजिक विषमता को दूर करना है। छेरछेरा के दिन दान से अमीर-गरीब का भेद मिटता है और समाज में समानता की भावना मजबूत होती है। हर घर, हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देता है, जिससे यह छेरछेरा पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक उत्सव भी बन जाता है । इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि इसमें धन की जगह अन्न का दान होता है। जिसमें बच्चे और युवाओं की टोलियां एक अनोखे बोल, बोल कर दान मांगते है… छेरछेरा…..माई कोठी के धान ला हेर हेरा….और जब तक घर की महिलायें या को घर का सदस्य अन्न दान नहीं देते तब तक वे कहते रहेंगे ‘अरन बरन कोदो दरन, जब्भे देबे तब्भे टरन’। इसका मतलब ये होता है कि बच्चे कह रहे हैं, मांँ दान दो, जब तक दान नहीं दोगे तब तक हम नहीं जाएंगे जो दान शीलता, सामूहिकता और किसानों की मेहनत, सामाजिक एकता और लोक संस्कृति का प्रतीक है। इस दिन घरों में विशेष छत्तीसगढ़ी व्यंजन जैसे आइरसा, ठेठरी , खुरमी बोबरा, सोहारी आदि बनाए जाते हैं। छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति का प्रतिबिंब है। यह पर्व समाज में परोपकार, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है। पारंपरिक गीत और नृत्य यहां के लोग अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे मांदर, नगाड़ा और झांझ ,तुरी इत्यादि के साथ गीत और नृत्य करते हैं। यह पर्व सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का माध्यम है।

फसल उत्सव: यह नई फसल की कटाई और धान को घर लाने की खुशी में मनाया जाता है जब किसान अपनी मेहनत की कमाई (अनाज) का कुछ हिस्सा दान करते हैं।

सामुदायिक एकता: यह पर्व समाज के सभी वर्गों को एकजुट करता है और सहयोग व दान की भावना को बढ़ावा देता है।मान्यता है कि छेरछेरा के दिन भगवान शिव ने माँ अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी और आज के दिन यह शाकंभरी देवी जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। दान करने से घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

कैसे मनाते हैं:: बच्चे और युवा टोलियाँ बनाकर डंडा नृत्य, ढोलक, मंजीरा , मृदंग जैसे वाद्य यंत्रों के साथ घर-घर जाते हैं। वे पारंपरिक गीत गाते हैं, जैसे “छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेर हेरा” लोग उन्हें धान, चावल, इत्यादि दान करते हैं। इस दिन घरों में विशेष छत्तीसगढ़ी व्यंजन जैसे आइरसा, ठेठरी , खुरमी बोबरा, सोहारी आदि बनाए जाते हैं।

सांस्कृतिक महत्व: धान यहाँ की संस्कृति और जीवनशैली का अभिन्न अंग है, और स्थानीय परंपराओं में इसका विशेष स्थान है, महोत्सव कला, संस्कृति, साहित्य, संगीत, कविता, खाद्य अभिव्यक्तियों आदि का एक भव्य उत्सव है।

वर्तमान स्वरूप:: शहरीकरण और ज़मीनी बदलावों के कारण अब यह पर्व मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित है और कई बार धान की जगह पैसे दान किए जाते हैं, लेकिन दान और सामुदायिक भावना का मूल स्वरूप आज भी कायम है।