त्रासदी की कहानी है हमने लिखी
वक़्त की तर्जुमानी है हमने लिखी
भूख से तोड़ती ज़िन्दगी दम कहीं
पीर होती सयानी है हमने लिखी
चंद्रशेखर भगत के लहू से सनी
इक दहकती जवानी है हमने लिखी
सूर रसखान तुलसी जुबाँ मीर की
बुद्ध की ज़िन्दगानी है हमने लिखी
ईंट – पत्थर बरसने लगे हर तरफ़
यह लहू की जुबानी है हमने लिखी
पेड़-पौधे नदारद नगर जल रहे
त्रस्त है राजधानी है हमने लिखी
काल का ग्रास बनने को मजबूर है
और लहर की रवानी है हमने लिखी
आज ‘प्रतिभा’ भटकती हुई देखकर
इक व्यथा खानदानी है हमने लिखी
–प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’
खजनी,गोरखपुर