( लखनऊ की सरज़मीन पर अदबी नशिस्त का आयोजन )
ग़ज़ल की खुश्क ज़मीं को दिया लहू हमने, सुम्बुल हाशमी,,,,،،،،
अनुराग लक्ष्य, 17 दिसंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
हम जब जब अवध की सरजमीं का ज़िक्र करते हैं तो शहर ए लखनऊ की नज़ाकत, नफासत के साथ उसके अदब का भी ज़िक्र करते हैं। क्योंकि यह सर ज़मीं हमेशा अदब और साहित्य प्रेमियों के ज़रिए गंगा जामुनी तहज़ीब की विरासत रहा है। खुशी की बात है कि यह सिलसिला अभी तक रवाँ दवाँ है।
मशहूर ओ मारूफ शायर और कुशल संचालक वासिफ फारूकी के आवास कुर्सी रोड पर उन्हीं की सदारत में एक अदबी नशिस्त का आयोजन किया गया। जिसका संचालन अख़्तर हाशमी ने की । जिन शोअरा हजरात ने अपने अपने शानदार कलाम से समायीन को बाग़ बाग़ किया, पेश हैं उनके अशआर,,,,,
वासिफ फारूकी,,,,,
शीशा नहीं जो तोड़ दिया जाऊं संग से,
मेरी शिकस्त सोचो किसी और ढंग से।
खालिद सिद्दकी,,,,,
भुलाए बैठे हैं जब से कनाअतों के सबक,
असीर ए नफ़्स हैं, महरूम हम सुकू से हुए ।
दीदार बस्तवी,,,,,
हर रजिस्टर से गैस हाज़िर हैं,
ऐसा लगता है हम मुहाजिर हैं ।
सुमबुल हाशमी,,,,,,
ग़ज़ल की खुश्क ज़मीं को दिया लहू हमने,
हम इस लिए ज़रा हट कर दिखाई देते हैं ।
फ़ेग़ार देवरियावी,,,,,
ज़ुल्म की बुनियाद पर यलगार है मेरी ग़ज़ल,
हुस्न की बातें नहीं तलवार है मेरी ग़ज़ल ।
सुलेमान अख़्तर हाशमी,,,,,
बच्चा बच्चा हो जहां खाक ए वतन पर कुर्बां,
उस फिलिस्तीन को कमज़ोर न समझा जाए ।
मुईद रहबर लखनवी,,,,,
मुमकिन है कि ग़फ़लत से उन्हें कुर्ब ए क़यामत ,
जो लोग अभी नींद से बेज़ार नहीं हैं।
आखिर में नशिस्त के आयोजक वासिफ फारूकी ने सभी अहबाब का शुक्रिया अदा करने के साथ नशिस्त के समापन की घोषणा की ।