अश्कों की रोशनाई से तासीर क़लम से, हंसने लगे जो ताज़ा ग़ज़ल उसको लिखेंगे, अमजद रहमानी,,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 19 नवंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
मेरी नज़र में आज इस दौड़ती भागती ज़िंदगी में अदब और साहित्य की पौध लगाना उतना ही मुश्किल है, जैसे कि आसमान से तारे तोड़ना। फिर भी कुछ नई पौध की नई नस्लें अभी भी अदब और साहित्य को अपने सीने में बसाए हुए इंसानियत की शमाँ जलाने का काम कर रहे हैं। ऐसे ही नामों में सिद्धार्थ नगर की धरती से एक नया नाम उभर रहा है। दुनिया ए अदब जिसे मुजाहिदुल इस्लाम अमजद रहमानी की शक्ल में जानती और पहचानती है। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज उनकी ही एक ख़ास ग़ज़ल से आपको रूबरू करा रहा हूँ ।
1 / खुशबू चमन गुलाब कंवल उसको लिखेंगे,
जान ए बहार, जान ए ग़ज़ल उसको लिखेंगे ।
2 / शम्स ओ क़मर का एक बदल उसको लिखेंगे,
हम आगरा का ताज महल उसको लिखेंगे ।
3 / घूमे थे साथ साथ गुलिस्तां में कभी हम,
एहसास के वरक़ पे वोह पल उसको लिखेंगे ।
4 / अशकों की रोशनाई से तासीर क़लम से,
हंसने लगे जो ताज़ा ग़ज़ल उसको लिखेंगे ।
5 / उल्फत वफ़ा खुलूस दुआओं के असर से,
दिल रक्खे जिसको याद वोह कल उसको लिखेंगे ।
6 / कैसे जिएंगे हम तेरी यादों के सहारे,
तू दिल में आया, दिल से निकल, उसको लिखेंगे ।
7 / पलकों को नूर ए ज़िंदगी, आँखों को कयामत,
अंजाम भी लिखेंगे, अज़ल उसको लिखेंगे ।
पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,
मुम्बई संवाददाता ।