मुझ पर मेरी हस्तीं कहीं से बार नहीं है,
हाँ राहे ज़िंदगी मेरी हमवार नहीं है।
क्यों आप के चेहरे पे शिकन आ गई इतनी,
हाथों में मेरे उर्दू का अख़बार नहीं है।
खरबों के घोटाले में है मसरूफ़ ये खादी,
और पूछिए तो कोई व्यापार नहीं है।
बच्चे तो मुझे छोड़ के कब के चले गए,
बस रूह है कि जाने को तैय्यार नही है।
लिखवा के चले आए हो क्यों महँगी दवाएँ,
बच्चा तो मेरा इतना भी बीमार नहीं है।
नवरत्न कहाँ ढुढ़ने तुम आ गए साहब,
अकबर का मेरे यार ये दरबार नहीं है।
इस तरह मुझे खीचें है ये घर की जरूरत,
मेरे लिए अब कोई दिन इतवार नहीं है।
कितनी भी तअस्सुब की फ़ज़ा लोग बनाए,
इस पार जो है अम्न वो उस पार नही है।
अम्मा की नदीम आज भी थी याद नसीहत,
बस इसलिये तो सेहन में दीवार नही है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥