*काश कोई होता…*
“जब कोई पास आकर कहता है — मैं हूँ तुम्हारे साथ”
जब जीवन की राहों में अंधेरे उतर आते हैं,
और हर उम्मीद जैसे सिसकियाँ भरने लगती हैं।
जब भीतर कुछ टूटता है, चुपचाप, बेआवाज़,
और कोई आवाज़ नहीं देती उस टूटन का साथ।
जब अपने भी अनजान बन जाते हैं साये,
और सन्नाटे तक पूछते हैं, “तू अब किसका हुआ?”
तब कहीं दूर से एक हल्की सी आहट आती है,
कोई संवेदना लिए, धीरे से पास चला आता है।
वो कहता है कुछ नहीं, बस आँखों से पढ़ता है,
तेरी खामोशियों की चीख, जो कोई और नहीं समझता।
वो बैठता है तेरे पास, बिना कोई कारण पूछे,
जैसे तेरे दर्द को वो खुद जी चुका हो पहले कभी।
उसके हाथों में न कोई इलाज होता है,
न वादे होते हैं कि सब ठीक हो जाएगा।
पर उसका होना ही काफी होता है अक्सर,
क्योंकि अकेले दर्द से लड़ना सबसे बड़ी सजा है।
वो शायद टूटा हो पहले, बिखरा हो हज़ार बार,
तभी तो जानता है, कैसे चुभती हैं चुप्पियाँ बार-बार।
कहते हैं ना —
“जिसने खुद अंधेरे देखे हों, वही दूसरों के लिए दीया बनता है।”
ऐसे लोग देवता नहीं, पर इंसानियत के फरिश्ते होते हैं,
जो बिना परख के, बिना शर्तों के साथ देते हैं।
दर्द बाँटने नहीं, समझने आते हैं,
तेरे घावों पर मरहम की तरह शब्द सजाते हैं।
तो अगर कोई तुम्हारे आंसुओं की वजह पूछे बिना
बस पास आकर कह दे,
“मैं हूँ तुम्हारे साथ…”
तो जान लो, वो ही असली अपनापन है,
वो ही सबसे सुंदर भाव,
जो हमें इंसान बनाता है —
दूसरों के दर्द में अपने दिल की धड़कन सुन पाना।
नेहा वार्ष्णेय
दुर्ग छत्तीसगढ़