जब अंतिम समय आएगा

“अंतिम साथ”

 

जब अंतिम समय आएगा,

ना धन साथ होगा,

ना नाम का शोर,

ना रिश्तों की भीड़,

ना पद, ना पुरस्कार, ना गौरव का ओर।

 

सभी लौट जाएंगे धीरे-धीरे,

जैसे समय खुद पीछे हटता हो,

और अकेला रहेगा बस एक शरीर —

निर्जीव, निश्चल, मौन।

 

तब साथ आएगा एक वृक्ष,

जिसे कभी तुमने जाना ही नहीं।

न उससे नाम पूछा,

न हालचाल लिया,

ना ही उसकी छांव में रुकने का वक़्त निकाला।

 

पर फिर भी,

वो ही निभाएगा तुम्हारा अंतिम साथ,

अपने आप को खोकर,

तुम्हें अग्नि देने के लिए —

चिता की लकड़ियों में बदलकर।

 

वो नहीं पूछेगा कि

तुमने उसे कभी पानी दिया या काटा,

वो नहीं बोलेगा,

बस जल जाएगा…

ताकि तुम मुक्त हो सको।

 

सोचो,जिसे हम जीवन भर अनदेखा करते रहे,

वो ही अंत में सबसे क़रीबी बनता है।

 

इसलिए, जब तक साँसें चल रही हैं,

हर वृक्ष को मत काटो,

क्योंकि एक दिन

वही तुम्हारे अंतिम सफ़र का साथी होगा,

निर्वाणी की अग्नि में मौन मित्र बनकर।

 

नेहा वार्ष्णेय

दुर्ग छत्तीसगढ़