ख़ुदा करे कि यह ईद सबको रास आए, ग़म का साया कभी भूले से भी न पास आए, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 31 मार्च
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
समस्त देश वासियों को ईद की दिली मुबारकबाद पेश करते हुए आज यही कह सकता हूं कि ,
ख़ुदा करे कि यह ईद सबको रास आए,
ग़म का साया कभी भूले से भी न पास आए ।
गुलों के साथ रहें खुशबुओं से महकें सब,
जो भी आए सभी की ज़िंदगी में ख़ास आए ।।
आज पूरा देश ईद की खुशियों से सराबोर है। इस पावन त्यौहार पर मैं अपने समस्त देश वासियों से यही कहना चाहता हूँ कि यह देश हमेशा से ही बहुत खूबसूरत रहा है। हिन्दू मुस्लिम इस देश की दो आँखें हैं। इसी सच्चाई के साथ हमें और आपको जीना है। साथ ही इस देश की एकता और अखंडता को लेकर आगे बढ़ना है। मैंने अपने कलाम के ज़रिए हमेशा इस देश की गंगा जमुनी तहज़ीब को आम करने की कोशिश की है और आज भी इस बात को बहुत ही फख्र के साथ कहना चाहता हूँ कि,
मेरे रोज़े को तू रखले तेरे नवरात्र मैं रखलूँ,
दिलों को जीतने की बस यही इक प्यारी सूरत है ।
मुहब्बत की अगर हों दर्सगाहें अब ज़माने में,
किसी भी मन्दिर ओ मस्जिद की बोलो क्या ज़रूरत है ।।
इस मुकाम पर आकर हमारा देश के प्रति जो फ़र्ज़ बनता है, वोह यह कि हम एक हिंदुस्तानी पहले हैं, हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई बाद में हैं। आइए आज इस ईद के पावन पर्व पर अपने अपने दिलों को साफ करते हुए एक दूसरों के प्रति जो भी दूरियाँ हैं, उन्हें इन चार पंक्तियों में समाहित कर दें कि,
आओ नफ़रत की यह दीवार गिरा दी जाए,
इक नई दुनिया मुहब्बत की बसा दी जाए ।
अम्न का दीप जलेगा ज़रूर भारत में,
गंगा जमुना की लहर फिर जो बहा दी जाए ।।
अंत में मैं आपसे सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि अगर मेरा यह कलाम आपके दिलों से होते हुए आपके घर आंगन तक पहुंच गया तो मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझूंगा।