अयोध्या में श्रीराम कथा के दौरान राधेश्याम शास्त्री महाराज के प्रवचन

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या, 20 जनवरी: श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में चल रही श्रीराम कथा के छठवें दिन राधेश्याम शास्त्री महाराज ने नारद जी के श्राप और मोह प्रसंग पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि तीर्थ यात्रा और भगवान के मंदिर में प्रवेश करने से घमंड और अभिमान दूर होता है। उन्होंने भक्तों को अच्छाई को अपनाने और बुराई से दूर रहने का आह्वान किया। शास्त्री जी ने कहा कि भगवान के स्मरण से भाग्य बदलता है। उन्होंने नारद जी के उदाहरण देते हुए बताया कि भाव भाग्य को बदल सकता है, लेकिन भाग्य भाव को नहीं बदल सकता। उन्होंने श्रीराम लला के सुमिरन का महत्व बताते हुए कहा कि इससे सभी का भाग्य बदल रहा है। शास्त्री जी ने नवधाभक्ति पर भी विस्तार से चर्चा की और भगवान, भक्त और भक्ति की श्रेष्ठता का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि प्रशंसा व्यक्ति के लिए हानिकारक होती है जबकि आलोचना व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने तुलसीदास जी की पंक्ति ‘निंदक न्यारे राखिए, आगे कुटी छवाय’ का उदाहरण देते हुए कहा कि निंदकों से विचलित नहीं होना चाहिए।
शास्त्री जी ने कहा कि व्यक्ति को पद मिलने पर कद बढ़ाना चाहिए, मद नहीं। उन्होंने रामचरित मानस के उदाहरण देते हुए बताया कि नारद जी, राजा प्रतापभानु और माता कैकेयी का पतन उनके विचारों में परिवर्तन के कारण हुआ।