तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूँ मैं, शेर कहता हूँ तो ग़ज़लों में समा जाता हूं मैं, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,


अनुराग लक्ष्य, 18 जनवरी
मुम्बई संवाददाता ।
मुंबई के अदब और साहित्य में अपनी शायरी से दिलों में राज करने वाले सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज एक कामयाब गीतकार की शक्ल में भी जाने और पहचाने जाने लगे हैं, जो उनकी शायरी की दुनिया में उनकी असाधारण प्रतिभा को दर्शाता है।
देखा जाए तो साहित्य और अदब की भूमिका समाज में हमेशा सार्थक रही है। दिलों को जोड़ने की बात की है, साथ ही सरहदों की खाई को भी पाटने का काम किया है। इसी फेहरिस्त में पिछले 25 वर्षों से पूर्वांचल के शायर सलीम बस्तवी अज़ीज़ी ने यही भूमिका निभाई है। प्रस्तुत है आज उनकी एक मशहूर ग़ज़ल,,,,
1/ मेरे खुदा मुझ्पे तेरा एहसान बहुत है
जो भी दिया, जितनी भी दी पहचान बहुत है ।
2/ मैं क्या करूंगा दुनिया की दौलत समेट कर
पैरों में ज़मीं सर पे आसमान बहुत है ।
3/ ख्वाहिश है जिसको चांद सितारे की उसको दे
ज़िंदा रहे दिल में मेरा, ईमान बहुत है ।
4/ मैं खौफ ज़दा क्यों रहूं, दुनिया के सामने
मालिक मेरे तू मेरा निगहबान बहुत है ।
5/ खुल्द ए बरीं के वास्ते है शर्त यह सलीम
इश्क ए नबी में तड़पे मेरी जान बहोत है ।
6/ तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूँ मैं,
शेर कहता हूँ तो ग़ज़लों में समा जाता हूँ मैं।
हमने माना मीर ओ ग़ालिब का नहीं है दौर यह,
फ़िर भी शौक़ ओ ज़ौक से अब भी सुना जाता हूँ मैं ।।