मां गंगा के दर्शन मात्र से ही धन्य हो जाता है जीवन- चिन्मयानंद

 

 

महाकुंभ में पावन गंगा स्नान सदैव मोक्षदायिनी
हर सनातनी बीस-बीस श्रद्धालुओं को करे प्रेरित
विश्व भर से श्रद्धालुओं को एकजुट करता है महाकुंभ
बस्ती: कटराकुटी धाम अयोध्या के पीठाधीश्वर महंत चिन्मयानंद ने कहा कि मां गंगा के दर्शन मात्र से जीवन धन्य हो जाता है। हिमालय से गोमुख से निकली गंगा सात धाराओं में विभक्त हुई। इन्हें गंगा, यमुना, सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गंडकी कहा जाता है। गंगा का आकाश ही तट है, ये देवलोक में अलकनंदा कही जाती है, पितृलोक में वैतरणी , पृथ्वी लोक में इनका नाम गंगा है। यह बातें जागरण महाकुंभ यात्रा के विमर्श कार्यक्रम में शुक्रवार को प्रथम सत्र के शुभारंभ के अवसर पर कही। कटरा कुटी के पीठाधीश्वर ने कहा कि महाकुंम्भ का ध्येय वाक्य ‘सर्वसिद्धिप्रदः कुम्भः है। हमारी संस्कृति की जीवनधारा गंगा है।

महाकुंभ हमारी आस्था है गंगा हमारी. माता है, हमारी संस्कृति की जीवनधारा है. गंगा सिर्फ नदी नहीं है, जो युगों से प्रवाहित हो रही है. इसके सनातन प्रवाह से भारतीय जीवन में धर्म, दर्शन, सभ्यता, अध्यात्म व मोक्ष की अविरल धारा समृद्ध और शाश्वत स्वरूप धारण करती है। इसके तटों पर शाश्वत सभ्यता का विकास से लेकर सनातन संस्कृति के पदचिन्हों का प्रमाण मिलता है. इसके कंकड़-कंकड़ में शंकर की अनादि सत्ता को स्वीकारने वाली भारतीयता गंगा से जुड़ी है, उसमें समन्वित है. वसुधैव कुटुंबकम का संदेश हो या विविधता में एकता का दर्शन कराती भारतीय संस्कृति की बात हो, गंगा हर समय और परिस्थति में समान रूप से अपना आशीर्वाद और प्रसाद देती रही है। महाकुंभ में गंगा तट पर सदियों से ध्यानी और ज्ञानी, साधक और परिव्राजक, संत और महात्मा साधना करते आये हैं। इसी गंगा के तट से कवियों, ऋषियों एवं तपस्वियों के विचार और कल्पना भी तरंगायित होकर साहित्य, धर्म व आध्यात्म को सबल और संस्कारित किया है। गंगा असंख्य भारतीयों के लिए मां है।

महाकुंभ में गंगा का दर्शन पावन है, तो गंगा स्नान मोक्षदायिनी होता है। महाकुंभ में गंगा स्नान जीवन का एक अनमोल काम है, जिसे हरेक गरीब-अमीर, ऊंचा-नीचा, स्त्री-पुरुष उसकी मुक्तिकारी गोद में डुबकी लगाकर अपने जीवन को धन्य करना चाहिए। यह अवसर बारह साल में एक बार आता है। पर इसके तट पर उत्सव होता है। कुंभ के पुण्य अवसर पर प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर स्नान के अवसर की कामना लिए लोग सालोंसाल तैयारी करते रहते हैं। पीठाधीश्वर ने कहा कि इस बार महाकुंम्भ का ध्येय वाक्य

‘सर्वसिद्धिप्रदः कुम्भः है इसका अर्थ है कि सभी प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाला कुंभ है। दुनिया के सबसे बड़े मेलों में शुमार महाकुंभ के लोगों को बहुमुखी बनाने का सफल बनाना है। महाकुंभ में देश भर से सभी संप्रदायों के साधु-संत बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। अमृत कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रूद्र, आधार को ब्रम्हा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। महाकुंभ का आयोजन विश्व भर से श्रद्धालुओं को एकजुट करने वाला एक महत्वपूर्ण सामाजिक और धार्मिक उत्सव है। चूंकि इस बार यह आयोजन प्रयागराज में हो रहा है, तो प्रयागराज के सबसे धार्मिक महत्व वाले स्थल यानी तीनों नदियों (गंगा, यमुना और सरस्वती) की त्रिवेणी संगम को भी महाकुम्भ के लोगो में जगह दी गई है। इसमें संगम की जीवंत छवि स्पष्ट रूप से नजर आएगी। ये नदियां जीवन रूपी जल के अनंत प्रवाह को दर्शाती हैं। पीठाधीश्वर ने आयोजन में आए सभी लोगों से संकल्प दिलाया कि आप लोग कम से कम बीस-बीस लोग महाकुंभ में अवश्य लेकर जाएं।
—-

अयोध्या से आए भूवनेश शास्त्री ने विमर्श को आगे बढ़ाते हुए कहा कि 40 कोस दूर से मां गंगा के स्मरण मात्र से मनोकामना की पूर्ति हो जाती है। महाकुंभ धार्मिक समृद्धि के साथ आर्थिक समृद्धि का संदेश दे रहा है। कुंभ का अर्थ घड़ा होता है। कुंभ मल रूप से घड़ा से जुड़ा होता है। शास्त्री ने महाकुंभ के इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि इसका आठ सौ वर्षाें का पुराना इतिहास रहा है।

महाकुम्भ मानव-जाति को पाप, पुण्य और अंधकार व प्रकाश का बोध कराता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु महाकुम्भ में आस्था की डुबकी लगाने के लिए पहुंचते हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस धार्मिक महाकुम्भ को आर्थिक महाकुम्भ के रूप में दिव्य, भव्य और नव्य तरीके से आयोजित करने का निर्देश दिया है और स्वयं समय-समय पर इसका निरीक्षण करते हैं। लोगो में शामिल कलश को आर्थिक समृद्धता के रूप में भी शामिल किया गया है। सीएम योगी के नेतृत्व में सतत विकास की राह पर अग्रसर उत्तर प्रदेश महाकुम्भ के आयोजन से आर्थिकरूप से और समृद्ध होगा।