मौत कबकी निगल गई होती, ज़िंदगी की लगाम तुझसे है, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,


अनुराग लक्ष्य, 18 नवंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
आज कलम चल नहीं रही है, शब्द अपनी मंज़िल तय नहीं कर पा रहे हैं। चिड़ियों का चहचहाना भी बंद है। सूरज अपनी तमाज़त के साथ पूरे शबाब पर भी नहीं दिख रहा है। माहौल में एक अजीब सा धुंधलका छाया हुआ है। राह के मुसाफिर भी स्तब्ध हैं। वातावरण में एक गहरी खामोशी के साथ कई सवालिया चेहरे आपस में कुछ गुफ्तगू भी करते नज़र आ रहे हैं।
मेरी आंखों ने जब यह मंज़र देखा तो मैने आसमान की तरफ अपने उठे हाथों से सवाल किया, या खुदा यह माजरा क्या है, तो जवाब आया, कि तुम्हारे अज़ीज़ दोस्त और भाई संजय पुरुषार्थी का पुनर जन्म हो चुका है। अब फिक्र करने की कोई बात नहीं है। इतना सुनने पर मेरी आंखों ने आंसुओं की सौगात के साथ अपने रब का शुक्रिया कुछ इस अंदाज़ में किया कि,
,,,, सुबह तुझसे है शाम तुझसे है, है जो मेरा यह नाम तुझसे है ।
मौत कबकी निगल गई होती, ज़िंदगी की लगाम तुझसे है।
मेरे हाथों में कुछ नहीं है खुदा,
है जो सारा निज़ाम तुझसे है ।
तूने संजय को दे दी फिर सांसें,
सारा यह इन्तेज़ाम तुझसे है ।
खुशी की बात है कि तकरीबन 15 दिनों तक अपोलो अस्पताल लखनऊ में चल रहे बेशुमार पीड़ा और दर्द को झेलते हुए देश का लाडला और सबके दिलों में अपनी मधुर आवाज का जादू बिखेरने वाला फनकार संजय पुरुषार्थी आज हमारे बीच है। और अपने परिजनों के साथ अपने शुभचिंतकों के साथ भी है। जिसे एक कुदरती करिश्मा ही कहा जा सकता है।
आपको बताते चलें कि प्रयागराज से उठी यह आवाज़ देश के बड़े बड़े साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर अपनी कामयाबी के परचम लहराते हुए एक उत्कृष्ट उदघोषक के रूप में जाने जाने वाले संजय पुरुषार्थी अब तमाम शारीरिक खतरों से दूर हैं। और खुदा ने चाहा तो जल्द अज़ जल्द वोह फिर हमारे और आपके बीच अपने उसी चिर परिचित अंदाज़ में हम सबसे रु बरु होंगे।