नवसस्येष्टि पर्व- आचार्य सुरेश जोशी

🌸 *ओ३म्* 🌸
🪷नवसस्येष्टि पर्व🪷
बहुत कम लोग जानते हैं कि दीपावली पर्व का वास्तविक नाम *नवसस्येष्टि पर्व* है।यह सत्य सनातन वैदिक धर्म का सामाजिक पर्व है। सत्य सनातन वैदिक धर्म के चार मुख्य सामाजिक पर्व हैं। *[१]* श्रावणी जिसमें सत्य सनातन संस्कृति के बालकों को यज्ञोपवीत कराकर गुरुकुल भेजा जाता था। *[२]* विजयादशमी जिसमें शस्त्र विद्या सीखने वालों का गुरुकुल में प्रवेश न नवीन शस्त्रों के साथ शक्ति प्रदर्शन की प्रतियोगिताएं होती थी। *[३]* नवसस्येष्टि पर्व प्रथम जिसका बिगड़ा रूप दीपावली है। *[४]* नवसस्येष्टि पर्व द्वितीय जिसका बिगड़ा रूप होली है।
इस समय हम चर्चा करेंगे *नवसस्येष्टि पर्व का परिवर्तित रुप दीपावली की*।
आओ हम जानते हैं अपने इस पर्व के विषय में। अधिकांश लोगों की यह मान्यता हैं कि इस दिन *भगवान श्री रामचंद्र जी रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे* उनके अयोध्या लौटने की खुशी में यह पर्व मनाया गया। तभी से यह पर्व सभी लोग मनाते आ रहे हैं।
किंतु इस पर्व का वास्तविक नाम *नवस्सयेष्टि पर्व* है। चूंकि यह पर्व शरद ऋतु में मनाया जाता है इसलिए इसे शारदीय नवस्सयेष्टि पर्व नाम से जाना जाता है।
*नव= नया*
*सस्य=अनाज*
*इष्टि=यज्ञ*
*अर्थात् नए अनाज का यज्ञ* ।
हमारे भारतवर्ष में मुख्यतः शरद ऋतु में धान की फसल आती है इसलिए गांव गांव में सामूहिक यज्ञ किए जाते थे। और नए अनाज की यज्ञ में आहुतियां दी जाती थी। यही इस पर्व का वास्तविक नाम है, यह इसका वास्तविक महत्व है। और यह हमारी सृष्टि के आरंभिक काल से चला आ रहा है, श्री राम के पिता दशरथ व उनके पूर्वज भी इस पर्व को इसी प्रकार मनाते आ रहे थे।
कुछ लोग आज के दिन लक्ष्मी का पूजन भी करते हैं। लेकिन वास्तव में लक्ष्मी को हम समझें लक्ष्मी को आज के दिन केवल धन प्राप्ति के लिए पूजा जाता है। जबकि *लक्ष्मी ईश्वर का ही, उस परमपिता परमात्मा का ही एक नाम है।* और उस ईश्वर की पूजा प्रार्थना तो हम नित्य करते ही हैं। पर्वों पर हम उस ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष पूजा करते हैं । ईश्वर से बुद्धि मांगना, बल मांगना, धन मांगना, यश मांगना, सब कुछ हम ईश्वर से ही मांगते हैं। इसलिए हम लक्ष्मी के सत्य स्वरूप को समझें और ईश्वर की यथावत आज्ञा का पालन करें, यही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
कुछ लोग आज के दिन *गणेश की पूजा करते हैं।* ऋषि दयानंद सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं, *’गण सँख्याने’* इस धातु से गण शब्द सिद्ध होता है। इसके आगे ईश वा पति शब्द लगाने से गणेश व गणपति शब्द बनते हैं। अर्थात यह नाम उस ईश्वर के ही हैं। और उसकी पूजा, उसकी उपासना हमें अवश्य करनी चाहिए।
इस पर्व को यदि हम श्री राम के साथ जोड़े तो भी इसमें कोई दोष नहीं आता। किंतु श्री राम के जीवन चरित्र का अनुकरण तो करना चाहिए। *श्री राम जैसा भाई, पुत्र, पति, शिष्य, व राजा हम बनने का प्रयत्न तो करें ।*
उन मर्यादाओं का हम पालन तो करें जिन मर्यादाओं को श्रीराम ने स्थापित किया। आज हम समाज में देखते हैं दीपावली के दिन हम *पटाखे छुड़ाते हैं फुलझड़ियां छूट आते हैं वायुमंडल को दूषित करते हैं* इससे सभी जीवो को हानि भी उठानी पड़ती है। अतः इस पर्व के दिन हम *बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करें, सामूहिक यज्ञ करें जिससे प्राणी मात्र को लाभ पहुंचे। यह हमारे ऋषि यों की परंपरा भी है और ईश्वर की आज्ञा भी।*
आज के दिन दूसरा महत्व इस तिथि का यह भी है कि आज के दिन एक *महान आत्मा, मानवता का सच्चा हितैषी, वेदों का उद्धारक, एक महान ऋषि, स्वामी दयानंद सरस्वती जी का भौतिक शरीर भी छूट गयाथा। वास्तव में ऋषि को विषपान दिया गया था। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र के लिए और इस मानव जाति के लिए, प्राणी मात्र के लिए बलिदान कर दिया। *ऋषि ने बलिदान दिया अपनी सभ्यता को बचाने के लिए, ऋषि ने बलिदान दिया अपनी संस्कृति को बचाने के लिए, ऋषि ने बलिदान दिया अपने धर्म को बचाने के लिए, ऋषि ने बलिदान दिया प्राणी मात्र के उद्धार के लिए, मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए* एक समय था जब यह राष्ट्र विश्व गुरु होता था किंतु अविद्या के कारण, आलस्य के कारण, प्रमाद के कारण यह राष्ट्र अपनी वेद विद्या से विमुख हो पतन की ओर चला गया। और यहां पर अविद्या इतनी फैल गई कि वेद का कहीं दूर-दूर तक कोई नाम लेने वाला नहीं बचा, और पाखंड, अविद्या, अज्ञान, समाज में घनघोर बढ़ गया।
लोग कहने लगे कि,’ *ब्रह्म वाक्यं जनार्दन:’ अर्थात् ब्राह्मण का वाक्य ईश्वर का वाक्य है।* वेद को सीमित कर दिया गया। शूद्र और स्त्रियों को वेद पढ़ने की मनाही कर दी गई। अविद्या, अशिक्षा, पाखंड पूरे समाज और राष्ट्र में व्याप्त हो गया। जनता शोषित थी पीड़ित थी।
अज्ञान रूपी अंधकार के ऐसे काल में *12 फरवरी 1824* को इस राष्ट्र में एक देदीप्यमान सूर्य का उदय हुआ जिसने 21 वर्ष की अवस्था में सन्यास ग्रहण कर पाखंड पर प्रहार करने आरंभ किए। *बाल विवाह का विरोध किया, सती प्रथा का विरोध किया, वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनर्स्थापना के लिए प्रयत्न किया। शुद्र व स्त्रियों की शिक्षा के द्वार खोलें। राष्ट्र उत्थान की योजनाएं बनाई। राष्ट्र की स्वतंत्रता की प्रथम ज्योति इसी व्यक्ति ने जलाई जिसे हम महर्षि दयानंद के नाम से जानते हैं।* समाज में व्याप्त बुराइयों का उन्होंने उन्मूलन करना प्रारंभ कर दिया इससे उनके विरुद्ध समाज में षड्यंत्र रचे जाने लगे। अनेकों बार उन्हें विश दिया गया किंतु हर बार उन्होंने विश देने वालों को क्षमा कर दिया। अंत में एक ऐसा कालकूट विष इस ऋषि को दिया गया कांच का चूरा उनके दूध में मिला दिया गया और विश्व मिला दूध उनको पिला दिया गया। जब इनका शरीर स्वस्थ नहीं हुआ तब इन्होंने *30 अक्टूबर 1883 को कार्तिक अमावस्या* के दिन इस भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। वास्तव में उस महान ऋषि की दुष्टों ने मिलकर हत्या की थी। और यह केवल ऋषि की हत्या नहीं, यह भारत के भाग्य की हत्या हुई, यह मानवता के भाग्य की हत्या हुई, यह विश्व समुदाय के प्राणी मात्र की हत्या हुई।
लगभग 5000 वर्षों के बाद हमें ऐसी एक पुण्य आत्मा का सानिध्य मिला जो शायद 100 -200 अथवा उससे भी अधिक वर्षों तक हमारे साथ रहती, हमारा मार्गदर्शन करती, मानवता का उपकार करती। उसको दुष्टों अपने स्वार्थ के लिए, अपनी अविद्या के कारण, अपनी अज्ञानता के कारण, अपने पाखण्ड को पोषित करने के लिए मात्र 59 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी हत्या कर दी। उस महान ऋषि ने अपना बलिदान दिया किंतु ऋषि के बलिदान के पश्चात भी यह बलिदान रुके नहीं। आर्यवीर लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद, महाशय राजपाल जैसे आर्य वीरों को बलिदान देने पड़े। इस राष्ट्र के लिए, इस संस्कृति के लिए, इस सभ्यता के लिए, प्राणी मात्र के कल्याण के लिए बलिदान हम और आप भी देते हैं। बली अर्थात भाग और दान अर्थात् देना। अर्थात *हम सब अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस राष्ट्र के लिए अपने समाज के लिए अपने धर्म के लिए अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हम सब दान देते हैं। और हम सब को दान देना चाहिए। ऋषि ने बलिदान क्यों दिया हम उसके महत्व को समझें। ऋषि ने हमें जीवन जीने का मार्ग दिया हम उस मार्ग पर चलें। ऋषि ने अपने जीवन काल में अनेकों ग्रंथों की रचना की किन्तु मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए जो ऋषि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अमर ग्रंथ है उसका नाम है सत्यार्थ प्रकाश।*
इस ग्रंथ में ऋषि ने हमें बताया ईश्वर को कैसे जाने? उसके नाम गुण कर्म स्वभाव कैसे हैं? हम अपने बच्चों का पालन पोषण उनकी शिक्षा कैसे करें? हमें क्या
पढ़ना है, क्या नहीं पढ़ना है? गृहस्ती का जीवन कैसा हो? हमारा बुढ़ापा कैसे सुखी बने? अर्थात वानप्रस्थ और सन्यास का मार्ग ऋषि ने हमारे लिए प्रशस्त किया। हमारा राजा कैसा हो? हमारी न्याय व्यवस्था कैसी हो? ईश्वर की पूजा पद्धति उसकी उपासना कैसे करे? उसकी प्राप्ति कैसे हो? जड़ और चेतन पदार्थ क्या है? विद्या क्या है? अविद्या क्या है? बंधन का कारण क्या है? मुक्ति का उपाय क्या है? हमारा आचार विचार खानपान कैसा हो? यह सब कुछ ऋषि ने हमें बता दिया है।
आओ ऋषि के इस बलिदान दिवस पर हम सब मिलकर संकल्प करें कि हम ऋषि के बताए मार्ग का अनुकरण अनुसरण करेंगे और अपने जीवन को उत्थान की ओर ले जायेंगे।हम तन मन धन से इस राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहें।और एकजुट होकर एक साथ मिलकर हम इस राष्ट्र और समाज के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करे। जितना हम आर्य करण का कार्य करेंगे उतना उतना हम इस राष्ट्र और समाज की रक्षा करेंगे क्योंकि आर्य निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है। आओ जुटे हैं हम इस आर्य निर्माण में, आओ जुटे हैं हम इस राष्ट्र निर्माण में।
🪷ऋषि को श्रद्धांजलि🪷
*थे न मठ मंदिर हवेली*
*खाट,ठाट,बाट, सोना,चांदी कहां पास,पैंसा था न ढेला था।*
*तन पर सु-वस्त्र न हाथ में न शस्त्र-अस्त्र,योगी न जमात कोई चेली थी न चेला था।*
*सत्य के सिरोही सब संहारे सब असत्य मत,संकट-विकट सब मर्दानगी से झेला था।*
*सारी दुनियां के लोग एक ओर थे प्रकाश। निर्भय दयानन्द अकेला था*
🌹महर्षि की विदाई🌹
*संवत् १९४०तक वैदिक विगुल बजा करके।*
*मुक्ति पथ के पथिक ने आकर आर्य समाज बना करके*
*पूर्णिमा के चंद थे काटे सबके फंद थे।*
*भीष्म वह 🍁दयानंद🍁 थे*
*जो विष को पीकर चल दिए*
🌻ऋषि ऋण!!🌻
इस दीपावली पर ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए हमें अपने -अपने परिवारों में निम्न कार्य करने हैं।
*[१]* अपने घरों की सफाई करें।
*[२]* आम,अशोक,केले के पत्तों का वंदन वार लगावें।पुष्पों की माला।
*[३]* यज्ञशाला बनाकर उसे रंगोली से सजाएं।
*[४]* गाय का घी व आम की समिधाएं भी
इकट्ठी कर लें।घी में
कस्तूरी,केशर मिलाएं।
*[५]* गूगल,पीली सरसों,चावल,काली,उर्द,तिल,नये धान की खील बालछड़,गुड़,पंचमेवा, गिलोय,चंदन मिलाकर हवन सामग्री मिलावें।
*[६]* बलिवैश्व देव के लिए मीठा भात,देशी घी की पूरी बना लें।
*[ ७]* प्रसाद के लिए मोहनभोग,खीर,पंचामृत बना लें।
*[८]* वैदिक विद्वान को बुलाकर पावन वेद
की ऋचाओं से यज्ञ करें।
*[९]* अपने आस-पढ़ोस,मित्र,सहपाठियों को बुलाकर उन्हें विद्वान का प्रवचन सुनावें।महर्षि दयानंद व ईश्वर भक्ति का सामूहिक भजन गावें।
*[१०]* सभी को प्रसाद बांटे। आये हुए अतिथियों को धन्यवाद करें।सबको नव-सस्येष्टि पर्व दीपावली की शुभकामनाएं देकर *घी,सरसों या तिल के तेल* का दीपक🪔 जलाएं।
*🌼क्या न करें🌼*
चर्बी से बनी मोमबत्ती न जलाएं।शराब न पियें।जुआं न खेलें।अधिक प्रदूषण वाले पटाका न जलाएं। *अस्पताल,अनाथालय,गौ-शाला जाकर अन्न,धन,वस्त्र का दान करें।*
🪷 *ओ३म्*🪷
आचार्य सुरेश वैदिक
प्रवक्ता एवं पंडिता रुक्मिणी शास्त्री आर्यावर्त साधना सदन पटूल नगर दशहरा बाग उत्तर प्रदेश।