हम सवाल क्यों नहीं करते? और जब करते भी हैं, तो अक्सर गलत व्यक्ति से करते हैं।
जब किसी महिला के साथ बलात्कार जैसी जघन्य घटना होती है, तो समाज का एक बड़ा वर्ग अपराधी से पहले पीड़िता से सवाल करने लगता है—वह कहाँ थी, किस समय बाहर निकली, क्या पहन रखा था, अकेली क्यों गई? जबकि वास्तविक सवाल उस व्यक्ति से होने चाहिए जिसने अपराध किया। किसी भी अपराध की जिम्मेदारी केवल अपराधी की होती है, न कि पीड़ित की।
इसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति साइबर ठगी, वित्तीय धोखाधड़ी या किसी छल का शिकार हो जाता है, तो लोग उससे पूछते हैं—”आप पढ़े-लिखे होकर भी धोखा कैसे खा गए?” जबकि सवाल उन ठगों से होना चाहिए जो योजनाबद्ध तरीके से लोगों को ठगते हैं। शिक्षित होना किसी व्यक्ति को धोखे से पूरी तरह सुरक्षित नहीं बना देता।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि छल और धोखे का शिकार केवल सामान्य लोग ही नहीं,बल्कि बड़े -बड़े राजा,योद्धा और साम्राज्य भी हुए हैं। महाभारत में शकुनि ने जुए के माध्यम से छलपूर्वक पांडवों से उनका राज्य छीन लिया। मुगल इतिहास में प्लासी के युद्ध (1757) में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मीर जाफर की गुप्त साजिश और विश्वासघात का लाभ उठाकर बंगाल पर अपना प्रभाव स्थापित किया। इसी प्रकार अनेक राज्यों में विश्वासघात,षडयंत्र और छल के कारण राजसत्ताएं बदलीं। ये उदाहरण बताते हैं कि धोखा किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता या शिक्षा के प्रमाण नहीं होता ,बल्कि अपराधी की सुनियोजित चाल का परिणाम होता है। इसलिए किसी पीड़ित का उपहास करने के बजाय समाज को धोखेबाजों और अपराधियों से जवाब मांगना चाहिए।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और इनके शिकार हर वर्ग के लोग बन रहे हैं। इसका अर्थ है कि अपराधी किसी की शिक्षा, पद या अनुभव नहीं देखते, बल्कि अवसर देखते हैं। ठगों का निशाना केवल अशिक्षित लोग नहीं होते।
समाज की भूमिका केवल दर्शक बनने और घटनाओं पर चर्चा करने तक सीमित नहीं होनी बल्कि सही व्यक्ति से सही सवाल पूछने की भी होनी चाहिए। यदि समाज अपराधियों ,ठगों और महिलाओं के विरुद्ध अपराध करने वालों का खुलकर सामाजिक विरोध करे,उन्हें सामान न दे और उनके कृत्यों की निंदा करे,तो अपराधों पर अंकुश लगाने में निश्चित रूप से मदद मिल सकती है।सामाजिक जागरूकता और नैतिक दबाव कई बार अपराधियों के मन में भय उत्पन्न कर देते है और अपराध की प्रवृत्ति को कम करने में सहायक होते हैं।
जब पीड़ितों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय समाज अपराधियों से जवाब मांगना शुरू करेगा ,तभी न्याय,संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की सही शुरुआत होगी। सही सवाल एक बेहतर समाज की पहचान है।
समय आ गया है कि हम अपन प्रश्नों की दिशा बदलें।
पीड़ित से नहीं ,अपराधी से सवाल करें। पीड़ित को संदेह की नहीं सहारे की आवश्यकता होती है। जिस दिन समाज सही व्यक्ति से जवाब मांगना शुरू कर देगा, उस दिन न्याय की राह और अधिक मजबूत होगी तथा हमारा समाज अधिक संवेदनशील, उत्तरदायी और सुरक्षित बन सकेगा।
*रुखसार परवीन*
*मोहल्ला महोली पुरा*
*निकट अज्जन मियां कम्पाउन्ड*
*बहराइच*
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