क्रांति का बच्चा: फिदेल कास्त्रो

क्या बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए नंगे पैर चले ताकि कुछ लोग लग्जरी कारों से चल सके? क्या कुछ लोग 35 साल तक इसलिए जिए की कुछ लोग 70 साल तक ऐस से जी सकें? क्या कुछ लोग अत्यल्प गरीब इसलिए बने रहे ताकि कुछ लोग बेतहाशा रईस बन सके? मैं दुनियां के उन बच्चों की आवाज हूं जिनके पास रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं है। उन बीमारों की आवाज हूं जिनके पास दवा नहीं है। उन लोगों की आवाज हूं जिनके जिंदा रहने के अधिकार और गरिमा छीन ली गई है। जी हां इन विचारों से केवल अपने कमरों को नहीं सजाया बल्कि उसे यथार्थ धरातल पर उतार कर अपने सुधारवादी कार्यों से पूंजीवादी नशे में पगलाएं देशों की होश ठिकाने लगाने में फिदेल कास्त्रों कभी पीछे नहीं रहें। 1959 ईस्वी में क्यूबा में क्रांति होने के पहले तक बटिस्टा की फौजी तानाशाही वाली अमेरिकी समर्थित सरकार थी। इस सरकार ने वहशीपन से क्यूबा को लूटकर एकदम निरीह बना दिया। जो भी नागरिक इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाता उसे रास्ते से हटा दिया जाता था। यहां के जल, जंगल, जमीन तथा खनिज संपदा पर अमेरिकी व्यावसायिक घरानों ने अपना एकच्छत्र कब्जा जमा लिया था। क्यूबा पर काबिज बटिस्टा फौजी तानाशाही को अपने ऐशो आराम तथा मुनाफे के लिए देश को बेचना भी कबूल था। इस तानाशाही सरकार तथा अमेरिका के उपभोक्तावाद ने क्यूबा को वेश्यावृत्ति,मारकाट तथा नशीली दावाओं के कारोबार करने वाले देश की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया था।
अपने सामने लहूलुहान तथा लूटने देश को कास्त्रों से देखा नहीं गया। वह हमेशा इन फौजी तानाशाही से आजादी के लिए बेचैन रहने लगे। अंततः 26 जुलाई 1953 ई. को मोंकाडा बैरक पर हमला बोलकर बटिस्टा के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। शीघ्र ही उन्हें गिरफ्तार करके पन्द्रह वर्षों लिए जेल में डाल दिया गया। पर आम जन में अपने नेक इरादों तथा कृत्यों के कारण ये गांधी के समान इतने लोकप्रिय थे कि व्यापक जन समर्थन के कारण इन्हें सन् 1955 ईस्वी में जेल से रिहा करना पड़ा। इन्होंने उस समय यह महसूस किया कि क्यूबा में कानूनी लड़ाई के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। अंततः वे मेक्सिको चले गए जहां उनकी मुलाकात पहली दफ़ा चे ग्वेवारा से हुई। जुलाई 1955 ई से 1 जनवरी 1959 ई तक क्यूबा की कामयाब क्रांति के दौरान फिदेल ने चे ग्वेवारा ,राहुत कास्त्रों तो तथा अन्य अनेक साथियों के साथ विभिन्न छापामार लड़ाइयां लड़ी। इस दौरान इन्होंने लड़ाइयों में अपने अनेक साथियों को खोया भी। पर देश आजादी की वह दीवानगी कभी कम नहीं होने दिया। इसी बलिदान, त्याग तथा संघर्षों का नतीजा यह निकला कि 1 जनवरी 1959 ई को क्यूबा में बटिस्टा का शोषण हमेशा के लिए समाप्त हो गया।इस देश के वासियों ने मुक्त हवा में सांस लिया।
देश को आजादी मिलने के बाद ये सन् 1969 से 76 ई. तक प्रधानमंत्री और फिर सन् 2008 तक बतौर राष्ट्रपति रहे। यह इनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, लगनशीलता और पीछे न मुड़ने की जीवटता ही थी जिसने पांच दशक तक विश्व तानाशाह अमेरिका के नाक में दम किए रहा। उनके आत्मविश्वास का पता इस बात चलता है कि जब वे क्रांति के संदर्भ में कहते हैं कि इसका कोई मुहूर्त नहीं होता है और न ही अलग से कोई व्यवस्था होती है।
अपितु यह काम मैं अब भी दस से पंद्रह लोगों की मदद से कर सकता हूॅं। अगर आपकों खुद पर भरोसा और योजना है तो यह बिल्कुल मायने नहीं रखता कि आप कितने छोटे हैं?
किसी भी समाज, संस्कृति तथा सभ्यता में परिवर्तन क्रांति के माध्यम से होता है। क्रांति लोगों की या नेतृत्वकर्ता की सक्रियता से आती है। प्रेमचंद ने कहा है क्रांति बैठे ठाले का धंधा नहीं अपितु एक नई सभ्यता को जन्म देता है। ऐसे ही सक्रियता से भरपूर कास्त्रों का जीवन का था। गाब्रिएल गार्सिया मार्केज ने लिखा है कि वह अपने आफिस में बंधे रहने वाले किसी अकादिमक लीडर की तरह नहीं है।वो जहां समस्याएं आती है वहीं उनको दुरुस्त करने की कोशिश करता है। अपनी खटारा कार में उसे देखा जा सकता है, उसके आजू बाजू मोटरसाइकिलों की गर्जना नहीं होती, वो हवाना के सुनसान इलाकों में अकेले निकल जाता है। कभी किसी सड़क के किनारे दिन के किसी भी पहर में। कभी-कभी भोर को भी। इन सब बातों से उसके बारे में किंवदंती चल पड़ी कि वो अकेला यायावर है, अव्यवस्थित और स्वच्छंद निद्रा रोगी, जो किसी भी वक्त मिलने के लिए नमक सकता है और अपने मेजबान को सुबह तक जगाये रख सकता है। हर समय सक्रिय रहने का मतलब यह नहीं था कि वह बैल बन जाता था। वह कार्य के साथ-साथ अवकाश को भी महत्तव देता था। पर अवकाश ऐसा होना चाहिए जिससे मनुष्य अपने आपकों कुछ नया महसूस कर सकें। इस तरह अवकाश के बाद वह अपने कार्यों को दुगुने उत्साह से कर सकें। उसकी धारणा थी कि काम करना सीखों लेकिन आराम करना भी सीखो। ये उतना ही महत्वपूर्ण है।
पत्र पत्रिकाओं तथा किताबों से उनका बेहद लगाव था। उसके अंदर ज्ञान पिपासा बलवती थी। दुनिया भर के 200 पन्नों के साथ वह सुबह नाश्ते पर बैठता।‌ हर रोज वह लगभग पचास दस्तावेज पढ़ डालता। खबरों से वाकिफ होने के बाद वह किताबों की तरफ मुड़ता और फिर उसे पढ़ने में मशगूल हो जाता था। सब लोग इस बात पर आश्चर्य रहते कि सार्वजनिक जीवन में इतना सक्रिय रहने के बावजूद वह कैसे इतना अगाध पाठक हो सकता है? गाब्रिएल गार्सिया मार्केज का मत है कि सुबह आंख खुलने से पहले वो कोई किताब शुरू करता है और अगली सुबह उस पर टिप्पणी करता है। वह अंग्रेजी पढ़ता है लेकिन बोलता नहीं है। ज्यादातर वो स्पेनिश पढ़ना चाहता है। और किसी भी वक्त ऐसे किसी भी कागज को पढ़ने के लिए हमेशा तत्पर है जिस पर अक्षर अंकित हो। जो उसके हाथ लग जाए। कोई एकदम हाल की किताब जिसका अनुवाद भी न हुआ हो उसे पढ़ने के लिए उसका अनुवाद करा देता है। एक परिचित डॉक्टर ने उसे ऑर्थोपेडिक्स पर अपनी किताब भेजी। वो पढ़ेगा भी, ये न जानते हुए‌। लेकिन हफ्तेभर बाद ही फिदेल की टिप्पणियों की लंबी सूची डॉक्टर के पास पहुंच गई।
पढ़ाई के प्रति यह ललक तथा दीवानगी उसकी इतनी थी कि अगले जन्म में लेखक बनने की तमन्ना उसके मन में घर कर गई थी। पढ़ाई के दौरान उसके पास एक नोट अवश्य हुआ करता थी। उसे जब भी कोई अच्छी सामग्री मिलती तो वह उसे फौरन नोट कर लेता। कभी-कभी रास्ते में चलते हुए उसे कुछ याद आता तो वह उसे नोटबुक में अंकित कर लेता। इतना ही नहीं वह किसी भी पेशेवर लेखक की तरह मौलिक लेखन का भी निरंतर प्रयास करता रहता। वह वाक्यों को कई बार काटता, उन्हें संशोधित करता रहता है जब तक उसे वह निष्कर्ष नहीं मिल जाता जिसे वह चाहता था।
पढ़ाई-लिखाई के साथ भाषण कला में वह काफी दक्ष था। उसकी आवाज में एक सम्मोहन शक्ति थी। जो श्रोता को अपनी ओर साधारणतया आकृष्टि कर लेती थी। अपने क्रांतिकारी जीवन के शुरुआती दिनों में उसने हवाना टीवी पर बिना रुके सात घंटे तक भाषण दिया था। उसका यह भाषण सबसे लंबे भाषण के रूप में गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ।‌ इससे पहले भी 29 सितंबर 1960 ई को संयुक्त राष्ट्र संघ में चार घंटे उन्तीस मिनट का सबसे लंबे भाषण पर भी उसका ही रिकॉर्ड था। शुरुआती दिनों में हवाना के लोग उसकी आवाज की सम्मोहन से परिचित नहीं थे। उस पर ध्यान तक नहीं देते थे। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ एक दिन ऐसा आया जब लोग एक कान अपने काम पर और दूसरा भाषण उसपर लगाए रहते। यद्यपि उसकी आवाज बैठी हुई थी जो कभी कभी महज एक सांसविहीन फुसफुसाहट बनकर रह जाती थी। एक डॉक्टर ने यहां तक अनुमान लगा दिया था कि अगले पांच वर्षों में उसकी आवाज चली जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि उसकी जुबान में उस आम आदमी, मजदूर तथा सर्वहारा की पीड़ा थी जो उसे बल प्रदान करती थी। जहां भी, जैसा भी अवसर मिलता वह उनके पक्ष में अपने भाषण,लेखन तथा कर्तव्यों से संबल प्रदान करता था। उसका जीवन हमे क्रांति, शिक्षा, लेखन तथा समर्पण का संदेश देता है। पाब्लो नेरुदा ने लिखा है कि उसकी पतली आवाज लगभग बच्चों जैसी आवाज सुनकर मैं तो दंग रह गया। उनके व्यक्तित्व में कुछ था जो आवाज के अनुकूल था।‌फिदेल बहुत बड़े आदमी होने का एहसास नहीं कराते। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई बच्चा टांगों के अचानक बढ़ जाने पर लंबा हो गया। जबकि चेहरा और कोमल दाढ़ी अभी भी बच्चे की हो।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती
8400088017