****भारत में नए युग के नारी की चुनौतियां****

 

कंधे से कंधा मिलाकर चलने का साहस जो रखती है ,
दुष्टो से डटकर लड़ती है डरकर ना पीछे हटती है ,
जिसे समझ लिया तूने अबला अच्छे-अच्छे पर भारी है ,
सौ सौ सिंघो सी बलशाली यह आज की युग की नारी है ।
‘नए युग की नारी’ या ‘नई स्त्री’ कुछ और नहीं बल्कि उन पुरानी परंपराओं का प्रतिकार है जिसने उसे वर्षों तक उपेक्षा के हासिये पर किनारे रखा। ‘नई स्त्री’ हर वह काम करेगी जो उसकी मर्जी पर निर्भर है। वह उन सीमाओं व बंधनोको तोड़ देगी जो पुरुषों ने स्त्री होने के कारण उस पर लाद दिए हैं। वह शिक्षित होगी, कुशल होगी, रचनात्मक होगी ,जगत की निर्मात्री होगी। वह अपनी भूमिका स्वयं तय करेगी ,वह उन्मुक्त होगी स्वच्छंद होगी शारीरिक तल पर, मानसिक तल पर और वैचारिक तल पर ।
स्त्री के नए पन या समाज में स्त्री की भूमिका को बदलने में सर्वाधिक प्रभाव 19वीं सदी के स्त्री मताधिकार आंदोलन का पड़ा। पश्चिमी देशों में औद्योगिकरण और शहरीकरण बढ़ने के साथ-साथ शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े ।इसमें उनमें शिक्षा विशेष कर व्यावसायिक शिक्षा का स्तर बढ़ा। अब वे पुरानी भूमिकाओं को त्याग कर समाज की बड़ी भूमिका में आने लगी ।
भारत की बात करें तो इस ‘नई स्त्री’ की कुछ सीमाएं भी हैं ।वह नई स्त्री दरअसल स्त्रियों को तो संबोधित करती है परंतु संपूर्ण विश्व या कहें विभिन्न समाजो और समुदायों की स्त्रियों को संबोधित नहीं कर पाती। इस नई स्त्री का आग्रह मूल रूप से पश्चिम की स्त्रियों को लेकर है। पूर्व की स्त्रियां प्राय: इसके विमर्श से बाहर हैं। क्योंकि पूर्व समाज की स्त्रियां आज भी स्त्रियों के लिए हो रहे परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं। तथा उन स्त्रियों को अच्छी नजर से भी नहीं देख रही हैं भारत की स्थिति पश्चिम की तुलना में बिल्कुल अलग है यहां की स्त्रियों की मन: स्थित पश्चिम से मेल नहीं खा पाती ।अगर कुछ नारीवादी स्त्रियां इसका प्रयास भी करती हैं तो वह महज कुछ समूह तक सिमट जाता है सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल पाती ।
पश्चिम में जहां स्त्रियों को समानत: शिक्षा, रोजगार तथा समानतामूलक कानून जैसे अधिकार प्राप्त हो चुके हैं ।और अब वह यौनिक स्वच्छंदता तथा पुरुषों से इतर विशिष्ट पहचान के लिए संघर्ष कर रही हैं। वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में अभी भी नारियों को सामान्य बुनियादी अधिकार भी प्राप्त नहीं है अभी भी भारत में महिलाओं को लेकर मूलत: शिक्षा ,रोजगार ,शौचालय, पर्दा प्रथा और तलाक जैसे ही मुद्दे केंद्र में है ।अभी भी ग्रामीण स्त्रियां वर्षों पुरानी परंपराओं- घूंघट जैसे अमानवीय रिवाज से बाहर नहीं निकल पाई हैं ।जब भारत अकाल भुखमरी और दासता से गुजर रहा था, उस समय पश्चिम की स्त्रियां पुरुषवादी सत्ता को चुनौती दे रही थी । उस समय तक पश्चिमी स्त्रियों को समानत: बुनियादी अधिकार मिल चुके थे या मिलने शुरू हो गए थे। भारत में नारीवादी मुहिम मूलत 60 के दशक से शुरू होती है (अगर सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह जैसे आंदोलन की बात छोड़ दी जाए क्योंकि इन्हें नारीवादी मुहिम के अंतर्गत नहीं रखा जाता) भारत में स्त्रियां जब तलाक और उत्तराधिकार जैसे बुनियादी अधिकारों की बात कर रही थी उस समय पश्चिम में कैट मिलेट और फायरस्टोन जैसी लेखिकाएं स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए प्रजनन की तकनीकी बदलने पर बात कर रही थी ।पश्चिम में जब स्त्री अपनी निष्क्रिय, अराजनीतिक तथा नाजुक छवि का बहिष्कार कर रही थी ।धरना प्रदर्शन में छोटे वस्त्रो,अधो वस्त्रो इत्यादि को स्त्री उत्पीड़न की वस्तु करार देकर फेंक रही थी ,मातृत्व के दायित्व को ठुकरा रही थी उस समय से लेकर आज तक भारतीय स्त्रियां उस मनोस्थिति में नहीं आ पाई हैं कि वह मातृत्व को ठुकरा सके या अपने स्त्री के सारे गुणो का बहिष्कार कर सकें ।
भारतीय संदर्भ में नई स्त्री की कल्पना वास्तव में एक चुनौती है। लेकिन समझना यह होगा कि हर समाज की अपनी संरचनात्मक विशेषताएं होती हैं। जरूरी नहीं कि पश्चिम की नई स्त्री भारत में भी उसी रूप में परिपूर्ण हो।हमें सामाजिक विशेषताओं के अनुसार ‘नई स्त्री’ के मानक बदलने होंगे । भारत की ‘नई स्त्री’ वह होगी जो अपने अधिकारों के प्रति जागरुक है, वह अपनी स्वतंत्र सत्ता के प्रति चेतन है, वह पुरुषों के विरोध में नहीं पुरुषों के बराबर में चल रही है। वह शिक्षा, रोजगार, राजनीति, आदि में बराबर की भूमिका निभा रही है वह जो अपने शारीरिक यौनिक अस्तित्व को महत्व देती है। वह मातृत्व को ठुकराती नहीं बल्कि बच्चों के पालन में पिता से बराबर की भूमिका के लिए लड़ती है वह पुरुष का विरोध नहीं बल्कि उसका सहयोग और समन्वय है।भारतीय संदर्भ में ‘नई स्त्री’ के मायने अलग हैं ।और यह ‘नई स्त्री’ अपनी उत्कट जीवटता के लिए परिपूर्णता की मार्ग पर संघर्षरत है। उन्हें स्त्री होने के सारे गुण वा मातृत्व को स्वीकार करते हुए ‘नई स्त्री’ की परिभाषा देनी होगी।
डॉ अश्वनी भट्ट
प्रवक्ता समाजशास्त्र