स्वरचित एवं मौलिक रचना -संजुला सिंह ” संजू “

स्वरचित एवं मौलिक रचना

___ ” बचपन की यादें “___

 

” ये हैं बचपन की सुनहरी यादें

जो अब स्वप्न बन कर रह गया

हम तो आज भी वही हैं , पर ———

ये बचपन ना जाने कहां खो गया ।

 

वो भी क्या जमाना था , जब

पराए भी अपने लगते थे , और

एक आज का जमाना है , जहां

अपनो से भी डर लगता है ।

 

कितनी मधुर मुस्कान थी तब

ना कोई भय , चिन्ता ना थी

आज भय में जी रहे हैं

मुस्कान कहीं पे खो गई ।

 

आज चिन्ता ना किसी को

और ना कोई परवाह है

था समय कितना वो प्यारा

फिक्र मेरी सबको थी ।

 

आज जब तस्वीर देखी

यादें ताजा हो गई

याद आई मां – पिता की

और ये अंखियां रो पड़ी ।

 

आज देखा आईना जब

वो भी फिर हंसने लगी

उसकी हंसी में भी छुपी थी

बातें कुछ यूं अनकही ।

 

वक्त कितना वो हंसी था

सबके साथ हंसती रही

आज तो मुद्दत भी बीते

पर , आती ना हमको हंसी ।

 

कितना निराला था वो बचपन

ना किसी की फिक्र थी

आज तो बस फिक्र ही में

जी रहे हैं हम सभी ।

 

संजुला सिंह ” संजू ”

जमशेदपुर(जमशेदपुर)