तुमको लिखना जज्बातों की,
एक रवानी लगती है।
स्याही भरूं अगर दिल से तो,
कलम दीवानी लगती है।
शब्दों का गर मेल करूं तो,
ऋतु बेमानी लगती है।
और तुम्हारा मिलन लिखूं तो,
एक कहानी लगती है।
फुर्सत में यदि लिखूं तुम्हें तो,
प्रीति पुरानी लगती है।
हार लिखूं और जीत लिखूं तो,
जीत तुम्हारी लगती है।
याद में लिख दूं भोर कभी तो,
सुबह सुहानी लगती है।
बिना तुम्हारे नींद लिखूं तो,
रात बिरानी लगती है।
कभी तुम्हें मैं गीत लिखूं तो,
भरी जवानी लगती है।
भक्ति लिखूं गर तुम्हें कभी तो,
वानी कबिरा लगती है।
राग लिखूं गर तुम्हें कभी तो,
मीरा दीवानी लगती है।
बाल कृष्ण मिश्र कृष्ण
बूंदी राजस्थान
०७-०८-२०२४