
अनुराग लक्ष्य, 20 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
आज़ादी की लड़ाई में जितना योगदान हमारे देश भक्तों का था, उतना ही हमारे देश के साहित्यकारों और कलमकारों का भी था, जिन्होंने अपनी लेखनी से इस देश की आजादी को परवान चढ़ाया । बहादुर शाह ज़फ़र और राम प्रसाद बिस्मिल को कैसे भुलाया जा सकता है। आज उन्हें कलमकारों को याद करते हुए कुछ अशआर मैं भी आपकी खिदमत में लेकर हाज़िर हो गया हूं,
1/ मैं शायर हूं मुहब्बत आम करना काम है मेरा
जहां वालों मुझे देखो मुहब्बत नाम है मेरा
हर इक दिल हो मुहब्बत से यहां लबरेज़ इंसां का
मिटे नफ़रत दिलों से बस यही पैग़ाम है मेरा ।
2/ तालियों की गड़गड़ाहट से दबा जाता हूं मैं
शेर कहता हूं तो गज़लों में समा जाता हूं मैं
हमने माना मीर ओ ग़ालिब का नहीं है दौर यह
फिर भी शौक़ ओ ज़ौक से अब भी सुना जाता हूं मैं ।
3/ अपनी मुट्ठी में लिए शम्स ओ क़मर बैठा हूं
तीर ओ तलवार लिए सख़्त जिगर बैठा हूं
जिनको मालूम नहीं क्या है हकीकत मेरी
उनसे कहदो, मैं लिए लाल ओ गुहर बैठा हूं ।
4/ तीर तरकश की चुभन का मुझे एहसास कहां
मैं तो मंज़िल की मिनारों पे नज़र रखता हूं
हौसला देखके रुख मोड़ ले समंदर भी
अपने सीने में इक ऐसा मैं जिगर रखता हूं ।
5/ अच्छा हुआ इस मुल्क ने अख़बार दे दिया
हम जैसे मुफलिसों का मददगार दे दिया
इतना ही नहीं आईनों की शक्ल में ,सलीम,
हर गोशे गोशे में एक कलमकार दे दिया ।