🌹 ओ३म् 🌹
📚 *साप्ताहिक वेद वाणी*📚
ओ३म् प्रेष्ठं वो अतिथ स्तुषे मित्रमिव प्रियम्।अग्ने रथं न वेद्यम्।। सामवेद मंत्र -५ ।।
🌸 *मंत्र का पदार्थ*🌸
हे मनुष्य! 🌻 मित्रमिव प्रियम् = मित्र के समान हित साधक 🌻 प्रेष्ठम्= अतिप्रिय 🌻अतिथिम्= निरंतर व्यापक 🌻वेद्यम् = जानने योग्य 🌻रथं न = रथ के समान सबके आधार और वाहक पहुंचाने वाले 🌻 अग्ने प्रकाशमान परमात्मा की 🌻 स्तुषे= तू स्तुति कर।
🪷 *मंत्र का विषय*🪷
इस मंत्र में जीवात्मा को यह समझाया है *सच्चा मित्र केवल परमात्मा है* उसी की स्तुति कर। संसार के जितने संबंध व मित्र हैं वो क्षणभर के सहयोगी हैं मगर तेरे संसार में आने से पहले और जब तक संसार में रहता तब तक और संसार छोड़ने के बाद भी *जो तेरा ज्ञानवान, समर्थ, अटूट व सच्चा मित्र है* वो केवल परमात्मा ही है।उसकी उपेक्षा व संसारियों से प्रेम तुझे बहुत महंगा पड़ने वाला है।
महात्मा तुलसीदास ने उस व्यक्ति के बारे में कुछ पंक्तियां लिखी हैं जो अपने *परं मित्र ईश्वर की उपेक्षा* करता है।
*हिय फाट उ ,फूट उ नयन,जर उ सो तन केहि काम।*
*द्रवै स्त्रवै पुलकै नहीं,तुलसी सुमिरन राम।।*
अर्थात् वह हृदय फट जाए जो प्रभु का नाम लेते ही द्रवित नहीं होता।वे आंखें फूट जांय जो भगवान को याद करने पर प्रेम के झरने नहीं बहाती।वह शरीर जो उसका नाम लेते ही पुलकित नहीं हो उठता,वो भस्म हो जाय।।
इसी बात को एक उर्दू के शायर ने भी कहा है।
*दिल वो क्या जिसको नहीं तेरी तमन्नाएं विसाल।*
*चश्म क्या जिसको तेरे दीद की हसरत ही नहीं।।*
आगे वेद की पावन ऋचाएं कहती हैं कि जिस प्रभू की स्तुति करने की तुझे प्रेरणा दे रहे हैं वो कोई साधारण नहीं है उसमें *छः विशेषताएं* हैं।
[१] वह प्रभु ही श्रेष्ठ मित्र के समान *हित साधक* है।
[२] वह सबसे अधिक प्रेम करने योग्य है। उसके लिए शब्द है *प्रेष्ठम्* जैसे अंग्रेजी में *ग्रेटेस्ट* है वैसे संस्कृत में ये *प्रेष्ठम्* है।
[३] *अतिथिम्* अर्थात् परमात्मा सर्वव्यापक है।मन में विचार होगा कि *अतिथिम् का अर्थ व्यापक कैसे?* इसके लिए आपको। *तिथि* शब्द को समझना होगा। तिथि का अर्थ होता है जिसकी समय सीमा है परमात्मा असीम होने से अतिथि है।
[४] चोथी विशेषता है ईश्वर की *वेद्यम्* अर्थात् इस असार संसार में केवल परमात्मा ही जानने योग्य है।वेद्यम का दूसरा अर्थ है कि उसे ढूंढने बाहर नहीं जाना है *वेद्यम् अर्थात् वह हृदय रुपी वेदी में* में ही प्रतिष्ठित है उसके लिए अलग से *जल चढ़ाने या बोल -बम* कहने की आवश्यकता नहीं है।
[५] पांचवीं विशेषता है कि वह *सर्वाधार* है। जैसे पुत्र का आधार माता पिता।माता पिता के आधार उनके माता-पिता और *जो समस्त माता -पिताओं का आधार है वह है सर्वाधिक परमात्मा।*
[६] अंतिम व छठा विशेषण बताया *अग्ने यानि परमात्मा प्रकाश स्वरूप* है। भौतिक+अभौतिक दोनों प्रकाश उसी परमात्मा के हैं अतः * *हे भवसागर में गोते लगाने वाले जीव सावधान!उसी परमात्मा की स्तुति कर* उससे अच्छा मित्र कोई नहीं है।
🏵️ *मंत्र का सार*🏵️
*जिसने सूरज चांद बनाया।*
*जिसने तारों को चमकाया*
*जिसने फूलों को महकाया।*
*जिसने चिड़ियों को चहकाया।*
*जिसने सारा जगत् बनाया।*
*हम उस ईश्वर के गुण गावें।*
*उसे प्रेम से शीश झुकावें ।।*
आचार्य सुरेश जोशी
*वैदिक प्रवक्ता*
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