किडनी हेल्थ: बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन हमेशा डायलिसिस का संकेत नहीं – समय पर पहचान और सही इलाज से बचाव संभव
बस्ती। अक्सर जब किसी मरीज की रिपोर्ट में क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ आता है तो परिवार में घबराहट फैल जाती है और पहला सवाल उठता है – “क्या अब डायलिसिस ही करना पड़ेगा?” लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। हर बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन किडनी फेल या डायलिसिस की अनिवार्यता का संकेत नहीं होता।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत, ने बताया कि क्रिएटिनिन बढ़ने का अर्थ यह है कि किडनी पर असर पड़ा है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किडनी पूरी तरह से खराब हो गई हो। किडनी की समस्या मुख्यतः दो प्रकार की होती है – एक्यूट किडनी इंजरी और क्रॉनिक किडनी डिजीज।
एक्यूट किडनी इंजरी: समय पर इलाज से पूरी तरह ठीक होने की संभावना
अचानक हुई किडनी की चोट को एक्यूट किडनी इंजरी कहा जाता है। यह अक्सर डिहाइड्रेशन, गंभीर संक्रमण, अचानक बढ़े ब्लड प्रेशर या सूजन संबंधी रोगों के कारण हो सकती है।
इसके लक्षणों में पेशाब कम या बंद होना, पेशाब में खून या प्रोटीन आना तथा अचानक क्रिएटिनिन का बढ़ जाना शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते पहचान और उपचार हो जाए तो अधिकांश मामलों में यह स्थिति पूरी तरह ठीक हो सकती है। कई बार मरीज को अस्थायी रूप से डायलिसिस की जरूरत पड़ती है, लेकिन बाद में किडनी पुनः सामान्य रूप से काम करने लगती है।
Chronic Kidney Disease: चुपचाप बढ़ने वाली बीमारी
क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) वह स्थिति है जिसमें क्रिएटिनिन तीन महीने या उससे अधिक समय से बढ़ा रहता है। यह बीमारी अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ती रहती है और रूटीन जांच में ही सामने आती है।
इसके प्रमुख कारणों में Diabetes, Hypertension, लंबे समय तक पेनकिलर का सेवन, पथरी और बार-बार होने वाले संक्रमण शामिल हैं।
यदि CKD शुरुआती स्टेज (1, 2 या 3) में पकड़ ली जाए तो इसे लंबे समय तक नियंत्रित किया जा सकता है और डायलिसिस से बचा जा सकता है। उन्नत स्टेज (4 या 5) में डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है।
इलाज के तीन प्रमुख स्तंभ
कारणों पर नियंत्रण – ब्लड प्रेशर और शुगर नियंत्रित रखना, पेनकिलर बंद करना।
आधुनिक दवाइयाँ – नई दवाएँ किडनी खराब होने की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं।
शारीरिक कमियों का उपचार – खून की कमी, विटामिन D की कमी, कैल्शियम-फॉस्फोरस असंतुलन आदि का इलाज जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ “क्रिएटिनिन कम करना” लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि मरीज की जीवन गुणवत्ता और आयु बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण है।
आयुर्वेद की दृष्टि से किडनी स्वास्थ्य
आयुर्वेद में किडनी से जुड़ी समस्याओं को “मूत्रवह स्रोतस की विकृति”, “शोथ” और दोष असंतुलन के रूप में समझा जाता है। इसमें कफ और आम का जमाव, वात वृद्धि तथा पित्त असंतुलन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
उपयोगी आयुर्वेदिक औषधियाँ (चिकित्सकीय सलाह से)
गोक्षुर – मूत्रवर्धक और किडनी सपोर्टिव
पुनर्नवा – सूजन और फ्लूइड रिटेंशन में सहायक
वरुण – पथरी व मूत्र रुकावट में उपयोगी
चंद्रप्रभा वटी – मूत्रवह स्रोतस के लिए पारंपरिक योग
गिलोय – इंफ्लेमेशन की स्थिति में सहायक
विशेष चेतावनी दी गई है कि यदि क्रिएटिनिन बहुत अधिक (5–6 से ऊपर) हो, पेशाब बहुत कम हो या डॉक्टर ने डायलिसिस की सलाह दी हो, तो केवल घरेलू या आयुर्वेदिक उपचार पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है।
डायलिसिस का अर्थ जीवन समाप्त नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि डायलिसिस किडनी का कार्य मशीन द्वारा करवाने की प्रक्रिया है। नियमित दवा, नियंत्रित आहार, शुगर और बीपी नियंत्रण तथा समय-समय पर फॉलोअप से मरीज लंबा और संतुलित जीवन जी सकता है।
निष्कर्ष
बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन हमेशा किडनी फेल का संकेत नहीं
एक्यूट किडनी इंजरी में पूर्ण सुधार संभव
CKD शुरुआती अवस्था में नियंत्रित की जा सकती है
समय पर जांच और नियमित फॉलोअप अत्यंत आवश्यक
जानकारी और जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा माध्यम है
विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि डर के बजाय जागरूकता अपनाएं, नियमित जांच कराएं और शुरुआती अवस्था में ही किडनी रोग को नियंत्रित करें।