जीवन का सार गीता हो।
नयनों का नीर पुनीता हो।।
कुरूक्षेत्र का सारा युद्ध ह्रदय में हमारे ही होनी है
जीते कौरव या पांडव हार तो हमारी ही होनी है
हे! जगदीश्वर तुम्हें ये बात अब हमें बतानी होगी
प्रतिज्ञा यदि नहीं तोड़े तुम तो कैसे गति हमारी होगी
नयनों से नीर बहे।
या गंग जलधार।।
जितना अर्जुन प्रिय है उतना ही दुर्योधन है प्रिय
जितना भीम प्यारा उतना ही दु:शासन है प्रिय
अर्जुन का शव हो या दुर्योधन का हमें अश्रु बहाना है
अपने प्यारे पुत्रों के खो देने का शोक हमें मनाना है
नयनों के नीर सूख गए।
अंतस्थ भी अब रूठ गए।।
छल से मारा गया अभिमन्यु तब हार हमारी हुई
उस अधर्मी दुर्योधन के कुचक्रों में संलिप्ता हमारी हुई
सुभद्रे के सामने हमें यह कलंकित मुंह छिपाना है
अभिमन्यु के करूण पुकार का वेदना बिसराना है
तीनों लोकों स्वामी तुम्हें ये बात बतानी होगी
प्रतिज्ञा यदि नहीं तोड़े तुम तो कैसे गति हमारी होगी
— वैभव पांडेय