ग़ज़ल, –
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मस्जिदों में क़याम और सही,
ज़ीस्त मौला के नाम और सही,,
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मैक़दे का निज़ाम और सही,
मग़फ़िरत का मुक़ान और सही,,
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होश पूरी तरह नहीं आया,
लाइये एक जाम और सही,,
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बाँट देता हूँ मैं अदीबों में,
ये अदब का सलाम और सही,
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कल जो होगा वो देखा जाएगा,
“एक शब का क़याम और सही”,,
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जंग जैसे हो टालिये साहेब,
भेजिये इक पयाम और सही,,
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क्या पता कल न हो मुक़द्दर में,
आइये एक शाम और सही,,
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मन का घोड़ा बहक न जाये कहीं,
खींच रखिये लगाम और सही,,
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“अक्स” पर आप का करम होगा,
तोहमतें उसके नाम और सही,,
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✍️अक्स वारसी,,
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