2122. 1122. 1122
उसकी आंँखों में कोई और है काज़ल की तरह।
हम सिसकते हैं लिए ज़ख्म ये घायल की तरह।
नींद आती नहीं बेचैन भी रहती हूंँ मैं।
इक सदी बीत गई तन्हा सा इक पल की तरह।
मुझको दीवाना बना छोड़ गए राहों में।
अब भटकती हूंँ अकेला ही मैं पागल की तरह।
बेवफ़ा थे मुझे मालूम था फिर भी देखो।
मैंने ओढ़ी थी उन्हें रेशमी आंँचल की तरह।
तू जो बदला तो बदलने की कसम खा ली है ।
अब “सखी” भी न रही बीते हुए कल की तरह।।
अंजना सिन्हा “सखी “
रायगढ़