दुनिया में इतनी भीड़ है, गुमनाम सा रहता है ओ,
ओ क्यूं गुमा है ऐसे, जो तेरे साथ-साथ रहता है।
गमों की आग में भी, जो मुस्कुराता रहता था,
ओ कोई और नहीं, जो तेरे आस-पास रहता है।
जहा पे डूब जाती थी, लोगों की आस सूरज से,
उसी धरा पे जल कर, रौशनी लुटाता रहता है।
जहां में फैले हुए, कुछ तमासगीरों को,
समय समय पे,जो आइना दिखाता रहता है।
गुजर रहा है हर घड़ी,सौदागरों की बस्ती से,
देखना है जिस्म पे, कब तक लिबास रहता है।
ओ लिख रहा है फिर कुछ, रेत के साहिल पर,
ये देखना है कब तक, समन्दर उदास रहता है।
साहित्यकार एवं लेखक –
डॉ आशीष मिश्र उर्वर
कादीपुर, सुल्तानपुर उ.प्र.