ग़ज़ल
सिर्फ खुशियों की बात करता है।
दुख को जो आत्मसात करता है।।
जिसपे होता है एतबार बहुत।
वो ही पीछे से घात करता है।।
रात कितना भी रोक ले कोई।
सूर्य आकर प्रभात करता है।।
उसकी बरकत कभी नहीं जाती।
जो भी मन से ज़कात करता है।।
दर्द की शाख पे है बैठा मगर।
मुस्कुरा कर वो बात करता है।।
अपनी कुर्सी बचाने की खातिर।
वो यहां जात पात करता है।।
विनोद उपाध्याय हर्षित