उसे भी पाठ मर्यादा का मनमोहन पढाते हैं।-प्रतिभा गुप्ता प्रबोधिनी

ग़ज़ल

मचे तूफान जब दिल में तो कान्हा याद आते हैं।
वही जो द्रौपदी की आबरू पल में बचाते हैं।।

हँसी थी जो दुर्योधन पर कहा था पुत्र अंधे का।
उसे भी पाठ मर्यादा का मनमोहन पढाते हैं।।

बिलखती कुलवधू को देखकर नज़रें झुकाए जब।
पितामह भीष्म अपने आप को दोषी बताते हैं।।

दिखाकर दंभ दुर्योधन न माने बात कान्हा की।
मचेगा युद्ध का तांडव कृष्ण तत्क्षण सुनाते हैं।।

सभा में धर्म का अपमान कर ‘केशव’ गँवा बैठा।
तजे शाही निवाला वह विदुर घर साग खाते हैं।।

मिटाने को अधम जग से प्रतिष्ठित धर्म को करने।
कन्हैया इक इशारे से महाभारत रचाते हैं।।

प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी’
खजनी, गोरखपुर

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