ग़ज़ल
बहुत ज़रूरी है ये नेकियाँ सजाए रख
दिलो दिमाग़ में इश्क़े नबी बसाए रख
इसी में बेहतरी शामिल है ज़िंदगानी की
हमेशा मेहरो खुलूसो वफ़ा सजाए रख
मिलेगी मंज़िले मक़सूद बिल यक़ीं इक दिन
है शर्त हौसलों से रिश्ता भी बनाए रख
किसी तरह से न हालात उस पे ज़ाहिर कर
गमों का बोझ अकेले ही तू उठाए रख
तुझे बनाया है इंसान हक़ त आला ने
वक़ार इज़्ज़तो तौक़ीर से बनाए रख
इसी के दम से ही रोशन है जिंदगानी तेरी
चराग यादों के दिल में सदा जलाए रख
ज़माना कर देगा रुसवा उसे किसी लम्हा
मुआश्क़े की हर इक बात को छुपाए रख
नज़ारा तैबा का फिर एक बार देखूँगा
इसी उमीद को तारिक़ सदा जगाए रख