🪵🪵 ओ३म् 🪵🪵
🌴 अथर्ववेद में मनोविज्ञान
आर्य समाज मंदिर गजाधर पुर संत कबीरनगर में चल रहे 🥝 वेद महोत्सव 🥝 में वेद ईश्वरीय वाणी है इस विषय पर विचार देते हुए कहा गया कि आधुनिक विज्ञान में प्राणी विज्ञान, वनस्पति विज्ञान पर तो चर्चा है मगर मानव का निर्माण जिस 🌿मनोविज्ञान 🌿 से होता है उसके लिए कोई पुस्तक नहीं है। जबकि अथर्ववेद का सम्पूर्ण प्रतिपाद्य विषय ही 🌻 ज्ञान-विज्ञान 🌻 ही है।इसी क्रम में अथर्ववेद में मनोविज्ञान का वर्णन करते हुए वेद की ऋचाओं है 🪷 परोपेहि मनस्पाप किम् शस्तानि शंससि 🪷 अर्थात् हे मेरे मन! पापों से बचो!!
ईश्वर व जीवात्मा के बीच में एक सेतु है उसी का नाम है 🌾मन🌾 परंतु यह मन हमेशा वाणी व शरीर से संबंध बनाकर १० प्रकार के पापों से बंध जाता है।जिसका क्रम इस प्रकार है।
🌲 मन के तीन पाप 🌲
(१) पर धन इच्छा(२) द्वेष(३) नास्तिकता।
🌲 वाणी के चार पाप 🌲
(१) झूठ(२)कटु (३) चुगली (४) मिथ्या प्रलाप।
🌲शरीर के तीन पाप 🌲
(१) हिंसा (२) चोरी (३) दुराचार
इन पापों से बचने के लिए वैदिक ऋषियों ने १० प्रकार के पुण्य करने की प्रेरणा की।जो इस प्रकार है।
🌼 मन के तीन पुण्य 🌼
(१)अस्पृहा (२)दया (३) आस्तिकता।
🌼 वाणी के चार पुण्य 🌼
(१) सत्य (२) मधुर (३)सरस (४) हितकारी।
🌼 शरीर के तीन पुण्य 🌼
(१) अहिंसा (२) दान (३) सेवा
अब यहां पर 🍁 पाप -पुण्य 🍁 की वैदिक परिभाषा जानना भी जरूरी है।मन-वाणी-शरीर से किये जाने वाले कर्मों का फल जब सुख -शांति-आनंद के रुप में जीवात्मा को मिलता है उसी को 🍁पुण्य 🍁 कहते हैं। ठीक इसके विपरित जब मन -वाणी-शरीर से किये जाने वाले कर्मों का फल दुख-अशांति-क्लेश के रूप में मिलता है उसे🍁 पाप 🍁 कहते हैं।
इस प्रकार अथर्ववेद के ऋषि 🧘 महर्षि अंगिरा 🧘 कहते हैं कि मन को पापों से बचाना जरूरी है तभी ईश्वर का साक्षात्कार होगा इसके लिए जीव को प्रतिपक्ष सावधान होकर १० प्रकार के पुण्यों में मन, वाणी,शरीर को लगाना चाहिए ।
इसी क्रम में हरदोई से पधारे पंडित नेम प्रकाश जी 🌸 पूजा करो पांच देवों की।जो चाहो कल्याण जगत🌸 और पंडिता रुक्मिणी जोशी 🌴 वैदिक भजनोपदेशिका बाराबंकी ने 🌴 🌸ऋषिवर देव दयानंद की पद्धति हमें अपनानी है।पंच महायज्ञों की पूजा घर-घर में करवानी है🌸 भजनों को सुनाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। संगीता चार्य रमेश पाण्डेय जी ने उच्च कोटि का वादन किया।
🌻 आचार्य सुरेश जोशी 🌻