मनवा है बेचैन सखी रे जबसे फागुन आया,
खो गया दिल का चैन सखी रे जबसे फागुन आया।
बागों में बैठी कोयल जब बिरहन गीत सुनाती।
दिल में उठती कसक हमारे कली कोई मुस्काती।
गुंजन करते भंवरे जब जब फूलों पर मडराते,
प्रेम लुटाते कलियों पर जब उड़ते है इठलाते।
छुकते मेरे नैन सखी रे जब से फागुन आया।
खो गया दिल का चैन सखी रे जबसे फागुन आया।
चले बसंती पवन जोर से लट मेरी बिखराए।
रखूं पांव मैं सम्हल सम्हल पर पायल शोर मचाये।
पिया मिलन की प्यास जगाती आग लगाती मन में।
सिरहन सी उठती है रह रह ताप बढ़ाती तन में।
ऐसा है दिन रैन सखी रे जबसे फागुन आया,
दिल का खो गया चैन सखी रे जबसे फागुन आया।
अपने अपने साजन के संग सखियां खेलें होली,
बिना रंग के बची हुई है मेरी लंहगा चोली।
पिया मेरे परदेश गए तो अब तक लौट न पाए।
दूरी उनसे कहूं सखी मैं अब तो सही न जाए।
बोल रही बिन बैन सखी रे जब से फागुन आया।
खो गया दिल का चैन सखी रे जबसे फागुन आया।
अंजना सिन्हा “सखी”
रायगढ़